नाग पंचमी की तैयारियों से गुलजार हुए बाजार, बभनगांवा नाग मंदिर में 'रहस्यमयी' परंपरा को लेकर उत्साह

बभनगांवा नाग मंदिर
सावन माह में नाग पंचमी की धूम लखीसराय जिले में है. बाजारों में त्योहार की रौनक बढ़ी है, वहीं बभनगांवा नाग मंदिर में एक रहस्यमयी परंपरा लोगों के कौतूहल का केंद्र बनी हुई है.
सावन महीने की शुरुआत के साथ ही लखीसराय जिले में नाग पंचमी पर्व को लेकर तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं. सोमवार को मनाए जाने वाले इस पावन पर्व को लेकर शहर के प्रमुख बाजारों में रौनक बढ़ गई है. वहीं, सदर प्रखंड के अति प्राचीन बभनगांवा नाग मंदिर में पारंपरिक पूजा-अर्चना और वार्षिक मेले को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है.
नाग पंचमी को लेकर बाजारों में बढ़ी चहल-पहल
पर्व को लेकर शहर के विद्यापीठ चौक और पचना रोड सब्जी मंडी में खरीदारों की भारी भीड़ उमड़ रही है. लोग पूजन सामग्री के साथ-साथ पारंपरिक व्यंजनों के लिए फलों और सब्जियों की खरीदारी कर रहे हैं:
- बाजार भाव: मंडी में आम लगभग ₹250 प्रति कैरेट और कटहल ₹30 से ₹50 प्रति पीस के हिसाब से बिक रहा है.
- विभिन्न तिथियां: जिले के कुछ ग्रामीण इलाकों में आषाढ़ पूर्णिमा के पांच दिन बाद तो कुछ स्थानों पर सावन अमावस्या के पांच दिन बाद नाग पंचमी मनाने की परंपरा है.
बभनगांवा नाग मंदिर: अरसे पुरानी आस्था और मेला
सदर प्रखंड की अमहरा पंचायत स्थित बभनगांवा का नाग मंदिर क्षेत्र का एक प्रमुख धार्मिक केंद्र है. इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना माना जाता है:
- वार्षिक मेला: प्रत्येक वर्ष नाग पंचमी के दिन बभनगांवा में एक भव्य मेले का आयोजन होता है, जहां दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं.
- विशेष पूजा: शाम के समय विद्वान पंडितों और आचार्यों द्वारा नाग देवता का विशेष श्रृंगार एवं पूजा-अर्चना की जाती है.
बंद मंदिर में रात को रखा जाता है दूध-लावा, सुबह उल्टे मिलते हैं बर्तन
मंदिर से जुड़ी एक अनोखी और रहस्यमयी मान्यता दशकों से लोगों के कौतूहल का केंद्र बनी हुई है. ग्रामीणों के अनुसार मंदिर में नाग-नागिन का अदृश्य वास माना जाता है:
- परंपरा: नाग पंचमी की रात मिट्टी के दो अलग-अलग बर्तनों में दूध और लावा रखकर मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. नियम के अनुसार, यह दूध गांव के ही तीन विशिष्ट परिवारों द्वारा उपलब्ध कराया जाता है.
- अनोखा दृश्य: अगली सुबह जब मंदिर खोला जाता है, तो कभी एक तो कभी दोनों मिट्टी के बर्तन उल्टे (पुलटे) मिलते हैं. बंद मंदिर के भीतर यह कैसे होता है, इसे आज तक कोई नहीं देख सका है.
- ग्रामीणों की मान्यता: वयोवृद्ध ग्रामीण मृत्युंजय सिंह बताते हैं कि एक बर्तन उल्टा मिलने का तात्पर्य यह माना जाता है कि समाज में अच्छाई और बुराई दोनों मौजूद हैं. वहीं, दोनों बर्तन पलटे मिलने का अर्थ है कि गांव में सच्चाई और धर्म आज भी पूरी तरह जीवित है.
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By Prabhat Khabar News Desk
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