पर्युषण के तीसरे दिन तेरापंथ भवन में सामायिक दिवस, 48 मिनट की साधना में श्रद्धालुओं ने साधा संयम और समता का भाव
कार्यक्रम में शामिल श्रद्धालु. | Prabhat Khabar Network
पर्युषण महापर्व के तीसरे दिन तेरापंथ भवन में सामायिक दिवस का आयोजन किया गया. श्रद्धालुओं ने 48 मिनट की सामायिक साधना के माध्यम से आत्मचिंतन, संयम और समता भाव का अनुभव किया. यह आयोजन कर्म बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने पर केंद्रित रहा.
पर्युषण महापर्व के तीसरे दिन स्थानीय तेरापंथ भवन में सामायिक दिवस श्रद्धा और आध्यात्मिक भाव के साथ मनाया गया. उपासक द्वय महावीर दुगड़ एवं झब्बर दुगड़ के सान्निध्य में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सामायिक साधना की. इस दौरान आत्मचिंतन, संयम और समता के भाव को जीवन में उतारने का प्रयास किया गया.
48 मिनट की सामायिक में राग-द्वेष से ऊपर उठने का अभ्यास
धर्मसभा में सामायिक के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए वक्ताओं ने कहा कि जैन धर्म में सामायिक केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा को अंतर्मुखी बनाने वाली साधना है. 48 मिनट की सामायिक के दौरान श्रावक सांसारिक गतिविधियों से विरत होकर राग-द्वेष से ऊपर उठने तथा सभी जीवों के प्रति अहिंसा और अभय की भावना रखने का प्रयास करता है.
समता में स्थित होना ही सामायिक का वास्तविक अर्थ
वक्ताओं ने बताया कि सामायिक का वास्तविक अर्थ समता में स्थित होना है. व्यक्ति जब कुछ समय के लिए बाहरी संसार से दूरी बनाकर अपने भीतर झांकता है, तो उसे अपनी प्रवृत्तियों और विकारों को पहचानने का अवसर मिलता है. क्रोध, मान, माया और लोभ से मुक्त होकर शांति तथा संयम की दिशा में आगे बढ़ना ही सामायिक साधना का उद्देश्य है.
नव तत्वों के जरिए समझाया कर्म बंधन से मुक्ति का मार्ग
कार्यक्रम के दौरान जैन दर्शन के नव तत्वों जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, पुण्य, पाप और मोक्ष के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई. वक्ताओं ने बताया कि संवर और निर्जरा के माध्यम से कर्मों के बंधन को रोकने तथा कर्मों के क्षय की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है.
स्वाध्याय और ध्यान से मन को एकाग्र करने का प्रयास

सामायिक दिवस के अवसर पर श्रावक-श्राविकाओं ने निर्धारित विधि के अनुसार सामायिक साधना की. स्वाध्याय, ध्यान और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से मन को एकाग्र करने का प्रयास किया गया. धर्मसभा में कहा गया कि भागदौड़ भरे आधुनिक जीवन में कुछ समय आत्मचिंतन के लिए निकालना मानसिक शांति और आत्मअनुशासन के लिए बेहद जरूरी है.
समता, संयम और अहिंसा के संकल्प के साथ हुआ समापन
कार्यक्रम में तेरापंथ समाज के श्रावक-श्राविकाओं सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी उपस्थित रहे. पूरे आयोजन के दौरान आध्यात्मिक वातावरण बना रहा. कार्यक्रम का समापन समता, संयम, अहिंसा और आत्मजागरण के भावों के साथ हुआ.
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