आपातकाल के समय लोकतंत्र के लिए जेल गए, बेटी को 11 महीने बाद देखा… अब पेंशन के लिए इंतजार

Edited by Shruti Kumari
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जेल से निकलने के बाद की फाइल फोटो

Emergency 1975 JP Senani Nagraj Nakhat: आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर जेपी सेनानी नागराज नखत की कहानी. लोकतंत्र बचाने के लिए जेल गए, बिहार में ड्रैगन फ्रूट खेती की राह दिखाई, अब अपने ही अधिकार के लिए लड़ रहे लड़ाई.

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किशनगंज से गौरव कुमार की रिपोर्ट:

Emergency 1975 JP Senani Nagraj Nakhat: घर में बेटी का जन्म हुआ था. मां की गोद में नई जिंदगी मुस्कुरा रही थी. लेकिन उस नन्ही बच्ची के सिर पर पिता का हाथ नहीं था. पिता लोकतंत्र बचाने की लड़ाई में जेल की सलाखों के पीछे थे.उन्हें यह तक नहीं मालूम था कि उनकी बेटी कैसी दिखती है.
बिहार में ड्रैगन फ्रूट खेती के अग्रदूत बने.

करीब 11 महीने बाद जब वे जेल से रिहा होकर घर लौटे, तब पहली बार अपनी बेटी को गोद में लिया. वह पल उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी भी था और सबसे गहरा दर्द भी.

यह कहानी है ठाकुरगंज के 80 वर्षीय जेपी सेनानी नागराज नखत की.देश आज आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ मना रहा है. लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वालों को याद किया जा रहा है. लेकिन नागराज नखत के लिए आपातकाल केवल इतिहास का अध्याय नहीं है. यह उस पिता की अधूरी कहानी है, जिसने लोकतंत्र बचाने के लिए अपने बच्चों का बचपन खो दिया.

जब लोकतंत्र की लड़ाई ने छीन लिया परिवार का साथ

25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ. मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई शुरू हुई. उस समय नागराज नखत संगठन के सक्रिय स्वयंसेवक थे.

पुलिस लगातार उनकी तलाश कर रही थी. वे गांव-गांव जाकर संगठन का काम करते रहे. आखिरकार 6 जनवरी 1976 को पोवाखाली एलआरपी चौक से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

भारत रक्षा नियम (डीआईआर) के तहत बिना मुकदमा चलाए उन्हें किशनगंज, पूर्णिया, भागलपुर और हजारीबाग जेल में करीब दस महीने तक रखा गया. 4 नवंबर 1976 को भागलपुर केंद्रीय कारा से उनकी रिहाई हुई.

बेटी का चेहरा देखने में लग गए 11 महीने

गिरफ्तारी के महज तीन दिन बाद उनकी पत्नी ने बेटी चंदा को जन्म दिया. घर में पहले से तीन छोटे बेटे थे. पूरे परिवार की जिम्मेदारी पत्नी के कंधों पर आ गई.

उस दौर को याद करते हुए आज भी नागराज नखत भावुक हो जाते हैं.वे कहते हैं,

“मेरी बेटी का जन्म हुआ और मैं जेल में था. उसके पहले रोने की आवाज नहीं सुन पाया. जब घर लौटा तो वह करीब 11 महीने की हो चुकी थी. पहली बार उसे गोद में लिया तो लगा कि जिंदगी का सबसे बड़ा सुख मुझसे छिन गया था.”

उनकी आंखों में आज भी वह खालीपन दिखाई देता है, जो एक पिता के अधूरे पितृत्व की कहानी कहता है.

जेल से लौटे तो खेतों में लिखी नई कहानी

जेल की जिंदगी खत्म हुई तो संघर्ष नहीं रुका. नागराज नखत ने खेती को अपनी नई पहचान बनाया.

वर्ष 2014 में उन्होंने किशनगंज में ड्रैगन फ्रूट की खेती की शुरुआत की. उस समय यह फसल बिहार में लगभग अनजान थी. प्रयोग सफल हुआ तो दूसरे किसानों ने भी इसे अपनाना शुरू किया.

आज सीमांचल सहित बिहार के कई जिलों में किसान ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं. इस बदलाव की नींव रखने वालों में नागराज नखत का नाम प्रमुखता से लिया जाता है.

अब बुढ़ापे में एक और संघर्ष

80 वर्ष की उम्र में नागराज नखत फिर लड़ाई लड़ रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार विरोधी कोई तानाशाही व्यवस्था नहीं, बल्कि सरकारी प्रक्रियाओं की धीमी रफ्तार है.

उनकी स्वतंत्रता सेनानी और लोकतंत्र सेनानी पेंशन बंद हो चुकी है. कई बार जीवन प्रमाण पत्र जमा किया गया. बैंक ने उनके जीवित होने की पुष्टि की. जिला प्रशासन ने जांच रिपोर्ट भी भेज दी.

लेकिन पेंशन अब तक बहाल नहीं हो सकी. वे कहते हैं, “लोकतंत्र बचाने के लिए जेल जाना स्वीकार था. लेकिन कभी नहीं सोचा था कि बुढ़ापे में अपने ही अधिकार के लिए इंतजार करना पड़ेगा.”

आधी सदी बाद भी बाकी है एक सवाल

आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर जब देश लोकतंत्र के प्रहरी रहे लोगों को याद कर रहा है, तब नागराज नखत की जिंदगी एक सवाल भी खड़ा करती है.

जिस व्यक्ति ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी आजादी खो दी. जिसने अपनी नवजात बेटी का चेहरा 11 महीने बाद देखा. जिसने बिहार में ड्रैगन फ्रूट की खेती की नई राह दिखाई.

वही आज अपनी बंद पड़ी पेंशन की बहाली का इंतजार कर रहा है.आधी सदी पहले उनके सामने जेल की सलाखें थीं. आज सरकारी फाइलों की दीवारें हैं. संघर्ष अब भी जारी है.

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