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1921 में रेलवे पीडब्ल्यूडी कार्यालय में हुई थी दुर्गा पूजा की शुरुआत

Updated at : 21 Sep 2025 10:58 PM (IST)
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1921 में रेलवे पीडब्ल्यूडी कार्यालय में हुई थी दुर्गा पूजा की शुरुआत

1921 में रेलवे पीडब्ल्यूडी कार्यालय में हुई थी दुर्गा पूजा की शुरुआत

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ठाकुरगंज. 100 साल पहले जानवरों की बलि के विरोध में छोटे स्तर पर शुरू हुई दुर्गा पूजा अब जिले की सबसे बड़ी पूजा में से एक बन गई है. मां काली के एक छोटे से मंदिर में शुरू हुई बाजार पूजा समिति ने पिछले सौ सालों में कई बदलाव देखे हैं. इसकी शुरुआत की कहानी काफी दिलचस्प है. स्थानीय निवासियों ने बताया कि ठाकुरगंज में पहली दुर्गा पूजा 1921 में रेलवे पीडब्ल्यूडी कार्यालय में हुई थी, जिसमें ठाकुरगंज के सभी निवासियों ने हिस्सा लिया था. हालांकि, कुछ मतभेदों के कारण, 1924 में स्वर्गीय डॉ कमलेश चंद्र लाहिरी ने लाहिरी मिल्स परिसर में पूजा शुरू की. शुरुआती पूजा में जानवरों की बलि दी जाती थी, तब स्वर्गीय गणपत राय केजड़ीवाल ने विरोध किया. स्थानीय लोगों के समर्थन से अगले साल से बाजार में काली मंदिर में दुर्गा पूजा शुरू की. उनके साथ स्वर्गीय मोहन लाल करनानी, स्वर्गीय कल्लू राम गड़ोडिया, स्वर्गीय हरिचरण चौधरी, स्वर्गीय पोरेश दत्ता, स्वर्गीय डॉ टिनकुड़ी सरकार और अन्य लोग शामिल थे. पहले पुजारी स्वर्गीय निहाल पंडित थे. एक छोटे से काली मंदिर में शुरू हुई यह पूजा अब एक भव्य मंदिर में मनाई जाती है. पूजा समिति के प्रमुख सदस्य डॉ एस सरकार, देवकी अग्रवाल, गोपाल केजड़ीवाल, दुलाल दत्ता, गणेश अग्रवाल व त्रिलोक अग्रवाल ने सैकड़ों लोगों के योगदान को याद करते हुए कहा कि स्वर्गीय ब्रजमोहन चटर्जी, स्वर्गीय रमेश बनर्जी, स्वर्गीय महावीर केजड़ीवाल, स्वर्गीय पन्ना लाल मोर, स्वर्गीय पन्ना लाल गड़ोडिया, स्वर्गीय श्याम केजड़ीवाल, स्वर्गीय बद्रीनाथ गड़ोडिया व स्वर्गीय कालाचंद, तपन दा व स्वर्गीय निरंजन मोर जैसे लोगों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. कई सालों से पूजा समिति के सक्रिय सदस्य रहे देवकी अग्रवाल कहते हैं कि पूजा की जगह इसकी शुरुआत के बाद से काफी बदल गयी है. पहले काली मंदिर के अंदर होने वाली पूजा को बाद में मंदिर के बरामदे में ले जाया गया. धीरे-धीरे जैसे-जैसे पूजा का स्वरूप बढ़ा, वैसे-वैसे आयोजन भी बड़े होते गए. मंदिर के एक कोने में शुरू हुई छोटी पूजा अब मंदिर के बाहर एक बड़े पंडाल में होती है. तब छोटा पंडाल एक भव्य संरचना में बदल गया. 1988 में, उसी जगह पर एक शानदार मंदिर बनाया गया, जहां भक्त मां दुर्गा व मां काली दोनों की पूजा करते हैं. महाषष्ठी से विजया दशमी तक मंदिर में भव्य धार्मिक कार्यक्रम होते हैं, इस दौरान मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाती है. मां दुर्गा की भव्य मूर्ति, आकर्षक सजावट और प्रसाद का भव्य वितरण ठाकुरगंज बाजार दुर्गा पूजा समिति की खासियत है. बंगाली कलाकारों का उपयोग और पारंपरिक बंगाली पूजा पद्धतियां इसकी पहचान हैं. 20 साल पहले बने ठाकुरगंज बाजार दुर्गा पूजा समिति के मंदिर के अंदर का कलाकृति ओडिशा व कोलकाता के मूर्तिकारों द्वारा बनाई गयी थी, जो इसे एक प्रमुख आकर्षण बनाती है. यहां मां दुर्गा की कोई स्थायी मूर्ति नहीं है. मूर्ति त्योहार के दौरान मंदिर परिसर में मूर्तिकारों द्वारा बनाई जाती है. ठाकुरगंज बाजार में मां दुर्गा का स्थायी मंदिर फूलों की मालाओं से खूबसूरती से सजाया गया है. सजावट हर दिन बदलती है, जिससे बड़ी संख्या में भक्त आते हैं. समिति के सदस्यों ने कहा कि वे पंडाल व मंदिर परिसर में भक्तों के लिए बेहतरीन लाइटिंग की व्यवस्था करते हैं. लाइटिंग इस पूजा पंडाल का एक खास आकर्षण है. हर साल एक नयी थीम प्रस्तुत की जाती है. सामाजिक संदेश झांकियों के माध्यम से दिए जाते हैं. कोलकाता के कलाकार विभिन्न वेशभूषा में मूर्तियां प्रदर्शित करते हैं. महा दशमी को रावण दहन इस पंडाल का मुख्य आकर्षण है. कई सालों से हो रहे इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग आते हैं. रावण दहन से पहले, देवी को चढ़ाए जाने वाले फूलों की माला की नीलामी होती है. बोली लाखों रुपये तक पहुंच सकती है. बड़ी संख्या में भक्त नीलामी में भाग लेते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AWADHESH KUMAR

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