विशेष . प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंग व भांग की जगह मदिरा ने ली
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :22 Mar 2016 4:30 AM (IST)
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होली पर चढ़ने लगा आधुनिकता का रंग राग रंग का पर्व होली बसंत का संदेशवाहक भी है. राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर उसे उत्कर्ष तक पहुंचाने वाली प्रकृति भी इस समय अपने बहुरंगी यौवन पर होती है. साथ ही आम के मंजर की खुशबू वातावरण को और मादक […]
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होली पर चढ़ने लगा आधुनिकता का रंग
राग रंग का पर्व होली बसंत का संदेशवाहक भी है. राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर उसे उत्कर्ष तक पहुंचाने वाली प्रकृति भी इस समय अपने बहुरंगी यौवन पर होती है. साथ ही आम के मंजर की खुशबू वातावरण को और मादक बना रही है. मगर बदलते समय ने इस पर्व में भी बदलाव कर दिये है.
दिघलबैंक : होली रंगों व हर्षोल्लास का त्योेहार है. लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं. प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग की जगह मदिरा और लोक संगीत की जगह फिल्मी गानों का प्रचलन इसकी आधुनिक विकृति के रूप में उभरे हैं.
महंगाई की मार : अन्य प
र्व त्योहार की तरह होली पर भी महंगाई का असर होना लाजिमी है. इको फ्रेंडली महंगे रंग और गुलाल से आम आदमी की दूरी अभी भी बरकरार है. शायद इसलिए गांव देहात में लोग उपलब्ध रंग गुलाल से ही होली खेलते हैं.
होली में पिचकारी का अलग महत्व : होली का त्योहार हो और रंग पिचकारी न हो ऐसा हो नहीं सकता. रंगों से सराबोर होली खेलने के लिए बाजारों में पिचकारी पट गयी है. बच्चों को लुभाने वाली विभिन्न प्रकार की चिपकारियों से बाजार भर गया है. रंग और गुलालों की दुकानों की रौनक भी काफी बढ़ गयी है.
बीस रुपये से लेकर दो सौ रुपये तक की पिचकारी बाजार में उपलब्ध है. इसमें बंदूक की शक्ल के साथ ही चिड़िया, गुब्बारा, हाथी आदि आकार के पिचकारियों की धूम है. होली के पर्व में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की कीमतें आसमान छू रही है. शराब निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत पर बेची जा रही है. वहीं रंग, पिचकारी, गुलाल, अबीर एवं पुआ पकवान में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की कीमत अचानक बढ़ गयी है.
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