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पांच दिवसीय झूलनोत्सव कार्यक्रम में बह रही भक्ति की सरिता

Updated at : 06 Aug 2025 10:27 PM (IST)
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पांच दिवसीय झूलनोत्सव कार्यक्रम में बह रही भक्ति की सरिता

चांदी के भारी भरकम झूले पर दर्शन दे रहे हैं भगवान श्रीराम परिवार

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-चांदी के भारी भरकम झूले पर दर्शन दे रहे हैं भगवान श्रीराम परिवार परबत्ता. प्रखंड के अतिप्राचीन भगवान श्रीराम मंदिर खजरैठा, सार्वजनिक ठाकुरबाड़ी कबेला, श्रीराधे श्याम ठाकुरबाड़ी नयागांव पचखुट्टी, अगुवानी ठाकुरबाड़ी आदि जगहों पर पांच दिवसीय झूलनोत्सव कार्यक्रम में भक्ति की गंगा बह रही है. ” मधुर मधुर नाम सीताराम सीताराम ” की ध्वनि से माहौल भक्ति मय हो उठा. भजन कीर्तन मंडली द्वारा मधुर संगीत से श्रोतागण को मंत्र मुग्ध कर दिया. श्रोतागण संध्या के समय भक्ति संगीत का का रस पान कर रहे हैं. भगवान श्रीराम मंदिर को फूलों की पंखुड़ियों से सजाया गया है. साथ ही भक्त गण चांदी के भारीभरकम झूले के पलने पर भगवान श्रीराम परिवार को विराजमान कर श्रद्धा भक्ति के झूला रहे हैं. इस मनोरम दृश्य को देखने के लिए मंदिर में भीड़ उमड़ पड़ी. झूलनोत्सव कार्यक्रम का समापन सावन की पूर्णिमा 9 अगस्त को संपन्न होगी. झूलनोत्सव का महत्व सावन में झूला झुलाने की परंपरा त्रेता से ही चला आ रहा है. भारतीय संस्कृति में झूलनोत्सव का विशेष महत्व है. झूलनोत्सव की शुरूआत मणिपर्वत से ही होती है. मणिपर्वत से कई किवदंतिया जुड़ी हुई है. मान्यता है कि राजा जनक जब अपनी बेटी सीता के घर आए तो परंपरा के अनुसार बेटी के घर न रुक कर उन्होंने रुकने के लिए जो स्थान लिया उसके एवज में उन्होंने इतनी मणिया दे दी कि उसने पहाड़ का रूप धारण कर लिया और जिस स्थान पर वे रहते रहे उस स्थान का नाम जनकौरा पड़ा जो वर्तमान में जनौरा के नाम से जाना जाता है. एक किवदंती यह भी है कि राजा कुश ने नागराज की बेटी पर क्रोधित होकर संपूर्ण नागवंश को समाप्त करने की बात कही तो नागराज ने इतनी मणिया उगली कि वह पर्वत पर्वत बन गया. यही आगे चल कर मणि पर्वत के नाम से विख्यात हुआ. एक अन्य मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि जब भगवान राम 14 वर्ष वनवास के बाद अयोध्या लौटे तो सीता जी ने एक दिन यूं ही कह दिया कि हरियाली युक्त पर्वतों पर विचरण की याद आ रही है उसी समय भगवान राम ने गरुण से वैसे ही पर्वत के निर्माण का आग्रह किया और गरुण ने मणियों से युक्त पर्वत का निर्माण किया. सीताजी यहीं पर क्रीड़ा करने आती रहीं. यहीं पर सावन में उनके लिए झूला पड़ता रहा. यही वजह है कि झूलनोत्सव मणिपर्वत से ही शुरू हुआ जिसको लेकर सावन में झूला पूजा का खास महत्त्व है. हर कोई भगवान को झूला झुलाने को लालायित रहते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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