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देवपूजा से महत्वपूर्ण है पितृ पूजा : विष्णु झा

Updated at : 16 Sep 2024 11:28 PM (IST)
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देवपूजा से महत्वपूर्ण है पितृ पूजा : विष्णु झा

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श्राद्ध कर्म न करने से घर का विकास हो जाता है अवरुद्ध

सुपौल

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर आश्विन अमावस्या तक पूरे 15 दिन पितृपक्ष प्रतिपादित किया है. इस पितृपक्ष में पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा कर्म के साथ किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं. श्रद्धा से श्राद्ध शब्द उद्धृत हुआ है. हमारे पूर्वज व मृत पितृगणों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया जाने वाला विशेष कर्म को श्राद्ध शब्द के नाम से जाना जाता है और हम इसे पितृयज्ञ भी कहते हैं. इसी में ब्राह्मण भोजन या अन्न दान की भी अत्यंत महत्ता है. सदर प्रखंड सुखपुर के निवासी और वर्तमान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से धर्मशास्त्र से आचार्य कर रहे छात्र विष्णु झा ने कहा कि भाद्रशुक्ल पूर्णिमा को ऋषि तर्पण से आरंभ होकर यह आश्विनकृष्ण अमावस्या तक पितृ पक्ष चलता है. इस दौरान पितरों की पूजा की जाती है और उनके नाम से तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन करवाया जाता है.

झा ने पंचांगों के आधार पर विवेचन प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस बार उदया तिथि नहीं मिलने के कारण द्वितीया तिथि की क्षय हो रही है. आश्विन कृष्ण प्रतिपदा 18 सितंबर बुधवार को सुबह 8:52 से प्रारंभ होकर 19 सितंबर को प्रातःकाल 6:26 तक है. भाद्रपद पूर्णिमा समाप्ति के बाद मध्याह्न व्यापिनी महालया प्रारंभ हो जायेगी. इसी के साथ पितृपक्ष प्रतिपदा का श्राद्ध या पार्वण 18 सितंबर को किया जायेगा. 19 सितंबर को प्रतिपदा तिथि प्रातःकाल 6:26 तक और सूर्योदय 5:56 में हो रहा है. इसलिए उदया तिथि में द्वितीया न मिलने के कारण द्वितीया तिथि की क्षय हो रही है. मध्याह्नव्यापित श्राद्ध होने के कारण पितृपक्ष द्वितीया का श्राद्ध या पार्वण 19 सितंबर को करना चाहिए. कहा कि जो लोग समय-समय पर श्राद्धों को न कर सकें, उन्हें कम से कम वार्षिक तिथि पर और आश्विन मास के पितृपक्ष में तो अवश्य ही अपने पितृगण के मरणातिथि के दिन श्राद्ध करना चाहिये. पितृपक्ष के साथ पितरों का विशेष संबंध रहता है.

मनुस्मृति में कहा गया है कि मनुष्यों के एक मास के बराबर पितरों का एक अहोरात्र (दिन-रात) होता है. मास में दो पक्ष होते हैं. मनुष्यों का कृष्णपक्ष पितरों के कर्म का दिन और शुक्ल पक्ष पितरों के सोने के लिए रात होती है. यही कारण है कि आश्विन मास के कृष्णपक्ष पितृपक्ष में पितृश्राद्ध करने का विधान है. ऐसा करने से पितरों को प्रतिदिन भोजन मिल जाता है. इसलिए शास्त्रों में पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण व पार्वण करने की विशेष महिमा लिखी गयी है.

पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पुत्र, आयु, आरोग्य, अतुल ऐश्वर्य और मनोवांछित वस्तुओं की प्राप्ति होती है. सनातन धर्माभिलंबियों के लिए श्राद्ध ही एक ऐसा कर्म है, जो सब कुछ प्रदान करवा सकता है. देवताओं की पूजा से अत्यंत महत्वपूर्ण हमारे पितरों की पूजा शास्त्रों में प्रतिपादित किए गए हैं. विष्णु झा ने बताया कि श्राद्ध न करने से सर्वप्रथम घर का विकास अवरुद्ध हो जाता है, घर में मांगलिक कार्यक्रम भंग होते और ना होते हुए पाए जाते हैं. ज्योतिष की बात करें तो श्राद्ध न करने से पितृ दोष या प्रेत दोष की संभावना जागृत होती है. अतः पितृगण की संतुष्टि तथा अपने कल्याण के लिए भी श्राद्ध करना चाहिए.

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