चौथम राजवंश के प्रजा महल से मिली 1940 की हस्तलिखित पूजा पद्धति की पांडुलिपि, संरक्षित

Published by :RAJKISHORE SINGH
Published at :27 Apr 2026 8:03 PM (IST)
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चौथम राजवंश के प्रजा महल से मिली 1940 की हस्तलिखित पूजा पद्धति की पांडुलिपि, संरक्षित

ज्ञान भारतम् मिशन ऐप पर किया गया राजवंश के प्रजा महल से मिली पांडुलिपि को अपलोड

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– ज्ञान भारतम् मिशन ऐप पर किया गया राजवंश के प्रजा महल से मिली पांडुलिपि को अपलोड चौथम. ज्ञान भारतम् मिशन के तहत देशभर की प्राचीन हस्तलिखित धरोहरों को संरक्षित करने का अभियान अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी हो रहा है. जिलाधिकारी नवीन कुमार के निर्देश पर कला एवं संस्कृति पदाधिकारी घनश्याम कुमार द्वारा अब तक 35 से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया गया है. यह पहल न केवल जिले की सांस्कृतिक विरासत को बचाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है. बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ऐतिहासिक धरोहर को संजोने का माध्यम बन रही है. चौथम राजवंश के युवराज शंभू के प्रजा महल से शारदीय नवरात्रि की पूजा पद्धति से संबंधित एक अत्यंत दुर्लभ हस्तलिखित पुस्तिका प्राप्त हुई. बताया गया कि यह पांडुलिपि सन् 1940 ईस्वी की है. इसमें नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठानों, मंत्रों और पारंपरिक विधियों का विस्तृत उल्लेख है. वर्षों से सुरक्षित रखी गई यह पुस्तिका अब डिजिटल रूप में संरक्षित कर दी गई है. ताकि इसकी सामग्री लंबे समय तक सुरक्षित रह सके. मुरारी सिंह के घर से भी उनके पूर्वजों द्वारा लिखी गई संस्कृत भाषा की धार्मिक चौपाइयों की पुस्तिका मिली. बताया जाता है कि यह पांडुलिपि करीब 80 से 90 वर्ष पुरानी है. धार्मिक और साहित्यिक महत्व को देखते हुए इसे भी ज्ञान भारतम् मिशन ऐप पर अपलोड कर कला एवं संस्कृति पदाधिकारी घनश्याम कुमार ने डिजिटल संरक्षण की प्रक्रिया पूरी की. स्थानीय स्तर पर हो रहे इस प्रयास को इतिहास और संस्कृति से जुड़े लोगों ने सराहना की. ग्रामीणों ने बताया कि गांवों और पुराने परिवारों में आज भी ऐसी कई अमूल्य पांडुलिपियां मौजूद हैं. जो समय के साथ नष्ट होने के कगार पर है. यदि इन्हें समय रहते डिजिटल रूप दिया जाए तो बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान मिल सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह अभियान सिर्फ दस्तावेजों को बचाने तक सीमित नहीं है. बल्कि यह भारत की पारंपरिक ज्ञान परंपरा, लोक आस्था और सामाजिक इतिहास को पुनर्जीवित करने का भी माध्यम बन रहा है. जिले में हुई यह पहल अब अन्य क्षेत्रों के लिए भी मिसाल बन सकती है.

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