मकर संक्रांति पर होता था दही-चूड़ा का आदान-प्रदान

Updated at : 10 Jan 2017 5:43 AM (IST)
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मकर संक्रांति पर होता था दही-चूड़ा का आदान-प्रदान

खगडिया : मकर संक्रांति को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं. सभी तबके के लोग इस त्योहार को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. फरकिया इलाका ने दूध-दही के लिए एक अलग पहचान बना रखी है. मकर संक्रांति को सूखा पर्व भी कहते हैं. क्योंकि घर घर में लोग दो दिनों तक दही, चूरा, तिलकुट, […]

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खगडिया : मकर संक्रांति को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं. सभी तबके के लोग इस त्योहार को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. फरकिया इलाका ने दूध-दही के लिए एक अलग पहचान बना रखी है. मकर संक्रांति को सूखा पर्व भी कहते हैं. क्योंकि घर घर में लोग दो दिनों तक दही, चूरा, तिलकुट, तिलवा, गुड़ आदि खाते हैं. तथा घर के चूल्हे नहीं जलाते हैं .

विलुप्त हो रही है परंपरा : मकर संक्रांति के मौके पर एक विशेष परंपरा देखने को मिलता था जो आज विलुप्त हो रही है. जिला के पशु पालक दूध उत्पादन बड़े पैमाने पर करती हैं. मकर संक्रांति के मौके पर अंग की धरती से उपजाऊ सुगंधित चावल के चूरा, गन्ने का रस का भूरा, गुड़ आदि अपने रिश्तेदार के यहां लेकर आते थे. वहीं अपने इलाके के मशहूर मिट्टी के बर्तन में जमे हुए दही एवं तिलवा, तिलकुट अपने रिश्तेदार के यहां ले जाते थे. दहीं, चूरा, तिलकुट का आदान प्रदान क्रमशः
एक सप्ताह तक चलता था. जो आज देखने को नहीं मिल रहा है. बदलते जमाने ने पुरानी परंपरा को विलुप्त कर दिया. मकर संक्रांति के एक सप्ताह पूर्व से ही बसों, ट्रेन एवं निजी वाहन में चूरा एवं मिट्टी के बर्तन में दही लेकर लोग अपने रिश्तेदार के यहां ले जाते हुए देखने को मिलता था. घर के नए रिश्तेदार को मकर संक्रांति का बेसब्री से इंतजार रहता था.
दो रिश्तों का होता था मिलन : कई पिता अपनी नवविवाहिता बेटी के यहां मकर संक्रांति के मौके पर मिट्टी के बर्तन में जमे हुए दही को अपने माथे पर लेकर जाते थे. ताकि जमा हुआ दही बरकरार रहे. इस पुरानी परंपरा के पीछे कई बातें, मधुर रिश्ते की मजबूती, अपने इलाके की खान पान की तरीके के साथ दो रिश्ते के मधुर संबंध देखने को मिलती थी. आस पड़ोस सभी अपने रिश्तेदार की उम्मीद लगाए रहते थे. मकर संक्रांति ही एक ऐसा त्योहार है कि सभी तबके के लोग अपने रिश्तेदार को याद करते हैं तथा कहते हैं कि कहां गए वो दिन अपनी पीढ़ी को मकर संक्रांति का आप बीती सुनाते हैं.
इस पर्व के बाद ठंड हो जाता है समाप्त
वहीं प्राकृति अपने कार्य को स समय कर रही हैं. मकर संक्रांति के बाद ठंड बुढे पड़ जाते हैं. प्राकृति नए रुप में प्रवेश करती हैं. किसानों की लहलहाती फसलें देश की समृद्धि की ओर ले जाती हैं. वहीं मकर संक्रांति के बाद मांगलिक कार्य का श्री गणेश हो जाएगा. मकर संक्रांति पर मलमास का समापन होता हैं. विवाह, गृह प्रवेश, देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण आदि मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाएगी. मकर संक्रांति पर गंगा स्नान फलदायी सिद्ध होता हैं.
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