बच्चों में बढ़ रहा रिफ्रेक्टिव एरर का खतरा

Updated at : 05 Dec 2016 6:31 AM (IST)
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बच्चों में बढ़ रहा रिफ्रेक्टिव एरर का खतरा

खगड़िया : पांच से लेकर पंद्रह साल की आयु वाले जिले के बच्चों में इन दिनों वार्म प्रो का खतरा मंडरा रहा है जो एडवांस स्टेज में पहुंच कर बड़ी आसानी से बच्चों को रिफ्रेक्टिव एरर नामक खतरनाक बीमारी की सौगात दे रहा है. बीमारी का पता चलने पर अभिभावकों में खासी परेशानी है. हालांकि […]

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खगड़िया : पांच से लेकर पंद्रह साल की आयु वाले जिले के बच्चों में इन दिनों वार्म प्रो का खतरा मंडरा रहा है जो एडवांस स्टेज में पहुंच कर बड़ी आसानी से बच्चों को रिफ्रेक्टिव एरर नामक खतरनाक बीमारी की सौगात दे रहा है. बीमारी का पता चलने पर अभिभावकों में खासी परेशानी है. हालांकि इस आयु वर्ग के बच्चों को डीवार्म अर्थात कृमि मुक्त करने के लिए सरकार के द्वारा विद्यालय स्तर पर तरह-तरह की दवाएं मसलन एलबेंडाजोल आदि उपलब्ध करायी जा रही हैं.

लेकिन प्रो वार्म होने के कारण सबसे अधिक बच्चों की आंखें प्रभावित हो रही हैं.

बच्चे इन दिनों प्रो वार्म होकर रिफ्रेक्टिव एरर नामक बीमारी से ग्रसित हो रहे हैं. इसके कारण कम उम्र में ही उनकी आंखों को मोटे ग्लास वाले चश्मे अथवा लेंस लगाने की मजबूरी बन रही है. आने वाले दिनों में वे कई प्रकार की सरकारी नौकरी में जाने से वंचित हो सकते हैं. हाल ही में क्षेत्र के सभी उच्च और माध्यमिक विद्यालय में नेत्र शिविर का आयोजन किया गया जिसमें शामिल स्कूली बच्चों में से अधिकतर बच्चों में रिफ्रेक्टीव एरर की खतरनाक अवस्था पायी गयी.
इस शिविर में शामिल डॉक्टरों ने बताया कि जांच में सबसे अधिक केस रिफ्रेक्टिव का ही मिला जिसका मूल कारण बच्चों के शरीर में तरह तरह के विटामिन की कमी का होना माना गया है. बच्चों के खानपान में विटामिन ए की कमी के कारण इस बीमारी का खतरा पहले से ही मंडरा रहा है. ऐसे में प्रो वार्म की चपेट में आ जाने से यह खतरा कई गुणा बढ़ जा रहा है.
बता दें कि आजकल जंक फूड खाने के बाद बच्चे हाथों को साफ नहीं करते जिससे संक्रमण का खतरा बनता है. अगर छह माह के अंतराल पर बच्चों को चिकित्सक की सलाह पर दवा देकर डीवार्म कर दिया जाए तो निश्चित ही वे प्रो वार्म होकर रिफ्रेक्टिव एरर के खतरे से बच जायेंगे. इसके लिए अभिभावकों को अपने नौनिहालों के स्वास्थ्य के प्रति हमेशा सचेत
रहना पड़ेगा.
इस बीमारी से बच्चों के विकास पर पड़ता है असर
कम उम्र में ही आंखों को मोटे ग्लास वाले चश्मे व लेंस लगाने की बन रही है मजबूरी
कृमि की चपेट में आकर होती है यह बीमारी, बच्चों पर पड़ता है असर
कहते हैं पीएचसी प्रभारी
सदर पीएचसी प्रभारी डॉ विनय कुमार शर्मा ने बताया कि खानपान में विटामिन ए के स्रोत को शामिल करते हुए समय समय पर बच्चों को डीवार्म कर हम इस खतरे से अपने नौनिहाल को बचा सकते हैं. हर भोजन के पहले हाथों की सफाई भी जरूरी है, क्योंकि इससे संक्रमण का खतरा कम हो जाता है.
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