शराबबंदी ने दिखायी जीने की नयी राह

Published at :29 Nov 2016 6:22 AM (IST)
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शराबबंदी ने दिखायी जीने की नयी राह

गोगरी : शराबखोरी और शराबबंदी की बात हो तो जिले के गोगरी प्रखंड के शिशवा गांव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह अक्सर चर्चा में रहने वाला गांव रहा है. शराब के चलते भी यह गांव चर्चा में रहा है. यहां की तो हालत कुछ ऐसी रही है कि गांव के कुछ लोगों का […]

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गोगरी : शराबखोरी और शराबबंदी की बात हो तो जिले के गोगरी प्रखंड के शिशवा गांव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह अक्सर चर्चा में रहने वाला गांव रहा है. शराब के चलते भी यह गांव चर्चा में रहा है. यहां की तो हालत कुछ ऐसी रही है कि गांव के कुछ लोगों का सूर्योदय शराब के साथ ही होता था और सूर्यास्त भी शराब के ही साथ. शराबबंदी से पहले गांव में दिनभर शोर-शराबा चलता.

झगड़े-फसाद होते. गाली-गलौज भी आम बात थी. गांव के महिला,बच्चे और बुद्धिजीवी बुरी तरह परेशान थे. पर शराबबंदी ने कई लोगों की व्यक्तिगत जिंदगी में काफी बदलाव लाया है. गांव की भी छवि बदली है. शिशवा गांव की ही बबिता देवी इस मामले में एक उदाहरण हैं. वह बताती हैं कि उनके पति शैलेश कुमार यादव को शराब पीने की बुरी लत लग गयी थी. गांव के कुछ लोगों ने उन्हें इस नशे का शिकार बना दिया. शराब पीने की ऐसी आदत लगायी कि उनकी सुबह और शाम शराब के साथ ही होती थी. शैलेश कुमार किसान का काम करते थे. लेकिन काम तभी करते थे जब शराब पीने व पिलाने के लिए पैसे नहीं रहते थे.

जब काम करते भी थे तो हमेशा डर बना रहता था. पता न कब क्या हो जाये. कहीं रास्ता चलते हादसे के शिकार न हो जायें. जो भी कमाते, साथियों संग शराब पर उड़ा देते थे. परिवार की अर्थव्यवस्था काफी खराब हो गयी थी लेकिन अब शराबबंदी के बाद स्थिति में बदलाव आया है. स्थितियां कि दो बच्चों का पेट पालने के लिए भी बबिता देवी को मायके वालों पर निर्भर होना पड़ा. मजदूरी ही रास्ता बचा. बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तो मुश्किल में थी ही. घर में जो कुछ मिलता शैलेश कुमार उसे बेचते और शराब पी जाते. घर में झगड़ा व तनाव रहता सो अलग.

एक-दूसरे से लड़ाई आम
गांव के दूसरे लोगों से भी नशे में लड़ाई-झगड़ा आम बात थी. एक बार बच्चे की तबियत अचानक ख़राब हो गई तो आर्थिक बदहाली के चलते मायके से पैसे लाकर इलाज करवाया था. बबिता देवी 2016 के जुलाई को याद करते हुए बताती हैं कि तब एक दिन शराबबंदी के लिए एक आमसभा हुई, जिसमें नशा उन्मूलन कमेटी बनी थी. गांव में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध की बात हुई. तय हुआ कि शराब पीने पर दंड भी लगेगा. लेकिन परिणाम ठीक उलटा हो गया.
गांव में शराब बेचने का विरोध करनेवाले ही बड़े पैमाने पर अवैध शराब की बिक्री करने लगे. फिर क्या था, शराबियों के लिए यह तो सोने पर सुहागा था. बाद में वर्ष 2016 के अगस्त में फिर एक बैठक हुई, जिसके अगले ही दिन बड़ी संख्या में महिला-पुरुष थानाध्यक्ष व डीएसपी से मिलकर आवेदन दिये और शराब की बिक्री पर रोक की मांग की. पुलिस ने कुछ शराब बेचने वाली दुकानों पर छापेमारी भी की. पर इसका भी असर नहीं हुआ.
बबिता देवी कहती हैं कि एक अप्रैल 2016 का दिन हम पीड़ितों के जीवन में नया सवेरा लेकर आया. सूबे में शराबबंदी ने शराब से उजड़ने वाले काफी परिवारों को तबाही से बचा लिया. अपना उदाहरण देते हुए बबिता देवी बताती हैं कि आज उनके पति शैलेश कुमार ठीक से कमा भी रहे हैं और पैसे भी बच रहे हैं. घर-परिवार की माली हालत भी सुधर गयी है. घर में प्रेम भी पनप गया है. बच्चे भी पढ़ रहे हैं. कमोबेश पूरे गांव में ही चीजें बदली हुई हैं. शराब के दंश झेलते अधिकतर लोग मानते हैं कि अगर जमीनी स्तर पर चीजें बदली हैं तो इसका सारा श्रेय तो शराबबंदी को ही जाता है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रयास से सफल शराबबंदी से अपराध, सड़क हादसे सहित कई अन्य प्रकार के अनैतिक कार्यों को भी लगाम लगा है.
एक-दो घंटे में एटीएम भी दे गये जवाब
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