हिंदी राजभाषा ही नहीं, हमारी नियत और संस्कृति भी : डॉ जितेश

Updated at : 09 Jan 2026 7:18 PM (IST)
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हिंदी राजभाषा ही नहीं, हमारी नियत और संस्कृति भी : डॉ जितेश

हिंदी राजभाषा ही नहीं, हमारी नियत और संस्कृति भी : डॉ जितेश

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कटिहार प्रत्येक वर्ष 10 जनवरी हिंदी भाषा के लिए समर्पित तिथि है. विश्व समुदाय के बीच हिंदी के उद्घोष को तीव्र करने के उद्देश्य से ही इस दिन को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं. सवाल है कि इस आयोजन से एक भाषा के रूप मे हिंदी कितनी विकसित हुई है. देखा जाए तो हिंदी का व्यावहारिक पक्ष इन दिनों काफी मजबूत हुआ है. राष्ट्रीय और सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टिकोण से हिंदी का वर्चस्व अन्य देशीय भाषाओं की तुलना में बढ़ गया है. देश ही नहीं बल्कि दुनिया में भी हिंदी, भारत देश का पर्याय बन चुकी है. इस उपलब्धि में प्रवासी भारतीयों ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. केबी झा कॉलेज के हिन्दी विभाग के असिस्टेंट प्रो डॉ जितेश कुमार का कहना है कि हिंदी की भाषागत प्रवृत्ति ऐसी है कि यह सरलता से सीखी जा सकती है. व्याकरणिक दृष्टि से यह काफी समृद्ध है, असीम संभावनाओं के इस दौर में हिंदी ने अपनी अलग पहचान बनाई है. जिसके कारण लोग हिंदी को अपना रहे हैं. भारत की गुलामी के दौर में हिंदी ने ही पूरे देश को एक सूत्र में बांधने का काम किया. उस दौर के लगभग तमाम महापुरुषों ने एक स्वर से हिंदी के प्रचलन को हृदय से स्वीकार किया था. आज जबकि देश स्वतंत्र है इस दौर में भी हिंदी की अपनी महत्ता सिद्ध हो चुकी है. 2006 से प्रत्येक वर्ष प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की याद को बनाए रखने के उद्देश्य से मनाया जाता है. हिंदी आज हर स्तर पर सशक्त हो चुकी है. व्यवसाय, सिनेमा, प्रबंधन आदि अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहां हिंदी अपनी पहचान बना चुकी है. हिंदी की कई पत्र-पत्रिकाओं ने इसके प्रसार में अपनी भूमिका निभाई है. विश्व के कई देश हिंदी शिक्षण आरम्भ कर चुके हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाषाओं की प्रतिस्पर्धा में हिंदी भी शामिल हो चुकी है. आज संख्या के मामले में यह विश्व की तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है. इंटरनेट पर हिंदी भाषा की डाउनलोडिंग लगातार बढ़ती जा रही है. यह केवल भारत में ही नहीं, हिंदीतर देशों में भी जारी है. हिंदी हैं हम की गूंज अब तेज़ होती जा रही है, यह हमारे लिए एक गर्व है.

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