सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं : आचार्य महाश्रमण जी

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सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं : आचार्य महाश्रमण जी फोटो नं. 10,11 कैप्सन-सत्संग में शामिल आचार्य महाश्रमण जी एवं उपस्थित श्रद्धालु प्रतिनिधि, कटिहारसांसारिक सुखों के मार्ग पर चलना आसान है, लेकिन संसार में रहने के बावजूद सांसारिक दिशा के विपरीत दिशा में चलने की हिम्मत रखना ही मनुष्य के जीवन की विशेषता है. […]

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सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं : आचार्य महाश्रमण जी फोटो नं. 10,11 कैप्सन-सत्संग में शामिल आचार्य महाश्रमण जी एवं उपस्थित श्रद्धालु प्रतिनिधि, कटिहारसांसारिक सुखों के मार्ग पर चलना आसान है, लेकिन संसार में रहने के बावजूद सांसारिक दिशा के विपरीत दिशा में चलने की हिम्मत रखना ही मनुष्य के जीवन की विशेषता है. यही मार्ग उसके जीवन को धन्य बनाता है और मोक्ष के द्वार तक ले जाता है. सांसारिक मार्गों पर चलना अनुस्रोत कहलाता है तो इससे अलग आध्यात्मिक मार्ग बना कर आत्मसाक्षात्कार करना प्रतिस्रोत का उत्तम उदाहरण है. झूठ, फरेब, लालच, हिंसा, मोह-मया अनुस्रोत के उदाहरण है तो अहिंसा, संतोष, सच्चाई, सत्कर्म प्रतिस्रोतगामिता के सबल उदाहरण है. इसलिए सभी मानवों को प्रतिस्रोत में चलने का अभ्यास करना चाहिए ताकि उनका जीवन सुखमय और शांतिपूर्वक व्यतीत हो और वह लोक के साथ परलोक को भी संवार सके. उक्त बातें बुधवार को तेरापंथ के ग्यारहवें गुरु आर्चा महाश्रमण जी महाराज ने अपने प्रात:कालीन प्रवचन के दौरान भक्तों को बतायी. नगर के शिवमंदिर के पास स्थित वृंदावन गार्डेन में आचार्यवर अपनी श्वेत सेना के साथ प्रवास कर रहे हैं और प्रवचन के लिए बने पंडाल में भक्तों को प्रतिदिन सत्कर्मों के साथ जीवन बिताने की प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं. अपने प्रवचन के दौरान उन्होंने बताया कि आदमी रोटी, कपड़ा, मकान, आभूषण, धन, शादी, बच्चों आदि के मोह माया में पड़ जाता है. अपने इन्हीं विचारों व ईच्छाओं की पूर्ति में वह परेशान व दुखी होता रहता है, किंतु इसके विपरीत साधु-संत इन सब समस्याओं से दूर रह कर अपने जीवन को सच्चाई व अहिंसा के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं और अपने मानव जीवन को सफल बनाते हैं. अनुस्रोत व प्रतिस्रोत को और विस्तार देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे जब हवा चल रही होती है तो उस हवा के अनुकूल चलना आसान होता है. लेकिन हवा के विपरीत चलना कठिन होता है. ठीक उसी प्रकार अच्छाई के मार्ग पर चलना कठिन व बुराई के मार्ग पर चलना आसान होता है. आचार्यश्री ‘सत्यमेव जयते’ को परिभाषित किया और कहा कि सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं होता. सत्य का वरण हमेशा विजयश्री ही करती है. असत्य सदा पराजित होता आ रहा है और आगे भी उसे पराजय का ही मुंह देखना पड़ेगा. संतों के बताये मार्ग पर चलने से मनुष्य का कल्याण हो जाता है. संतों का समागम ही बहुत दुर्लभ है. यदि मानव को संतों का सानिध्य मिल जाय तो भी उसका जीवन सफल हो जाता है. उन्होंने एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी में पुनि आध की वास्तविकता से परिचय कराते हुए श्रोता समूह को बताया कि साधु-संतों की अल्प समय की संगति भी मानव का कल्याण करने में सक्षम है. साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा जी ने भक्तों को अपनी प्रेरणामयी वाणी का रसपान कराया. इस दौरान उन्होंने कहा कि सभी को हमेशा सच्चाई का मार्ग अपनाना चाहिए. विकार रहित जीवन जीना चाहिए. कलुषित जीवन हमेशा कष्टकारी होता है. इसलिए कलह से मुक्त रहना चाहिए. अपनी वाणी को संयमित रखना चाहिए.

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