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वैशाख माह में मां ब्रह्मदेवी की पूजा का है विशेष महत्व

भक्तों की उमड़ रही भीड़

सोनो. प्रखंड मुख्यालय सोनो के पश्चिम छोर स्थित बरनार नदी के पार तट पर स्थित मां ब्रह्मदेवी मंदिर में इन दिनों भक्तों की बड़ी भीड़ उमड़ रही है. दरअसल वैशाख माह में मां ब्रह्मदेवी की पूजा का विशेष महत्व होता है लिहाजा इस मंदिर में पूरे वैशाख माह बड़ी संख्या में भक्त पूजा के आते हैं. खासकर सुबह के समय में मंदिर में काफी भीड़ होती है. इसमें महिला श्रद्धालुओं की संख्या सर्वाधिक होती है. कई स्थानीय भक्त तो पूरे माह हर दिन मां ब्रह्मदेवी मंदिर पहुंचकर पूजा करते हैं. प्रातः मंदिर की ओर जाने वाली सड़क पर पूजा की सामग्री साजी में लिये भक्तों की लंबी कतार देखी जाती है. यह सिलसिला पूरे वैशाख माह तक चलता है. चूंकि मां ब्रह्मदेवी मंदिर परिसर में ही शिवालय भी है और वैशाख माह में शिवालय में पूजा का भी विशेष फल मिलता है. इसलिए भक्त यहां आकर एक साथ माता और शिव जी की पूजा का फल प्राप्त करते हैं. वैशाख में माता की पूजा का विशेष फल मिलने और माता के समक्ष की गयी मिन्नतें पूरी होने की बात पंडित बताते हैं. इस कारण स्थानीय श्रद्धालु के अलावे अन्य दूरस्थ गांव से भी भक्त यहां आकर पूजा करते हैं और मां ब्रह्मदेवी से आशीर्वाद मांगते हैं.

जप-तप और दान का माह है वैशाख:

मंदिर के पुजारी पंडित उपेंद्र पांडेय बताते है कि वैशाख माह बड़ा ही पवित्र माह है. उन्होंने कहा कि स्कंद पुराण में भी वैशाख माह को ब्रह्मा जी ने श्रेष्ठ माह बताया है. इमहीरथ नामक राजा ने वैशाख माह में ही पुण्य स्नान और पूजा कर बैकुंठ धाम की प्राप्ति की थी. पुराणों में इस माह को जप तप और दान का माह बताया गया है. चूंकि मां ब्रह्मदेवी मंदिर नदी के तट पर स्थित है, इसलिए भक्त यहां आकर स्नान पूजा कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. श्रद्धालु भी मानते हैं कि वैशाख माह में यहां पूजा के लिए आने पर असीम शांति और सकारात्मकता का अनुभव होता है. इसके अलावे सुबह-सुबह पैदल चलकर मंदिर पहुंचने पर स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है. बताते चलें कि कई स्थानीय श्रद्धालु मां ब्रह्मदेवी मंदिर व शिवालय में पूजा के उपरांत वापसी में काली माता मंदिर आकर भी पूजा करते हैं.

माता के पिंडी की होती है पूजा:

विदित हो कि मां ब्रह्मदेवी के प्रति लोगों की अगाध आस्था और विश्वास है. नदी तट पर स्थित मंदिर में माता के पिंडी की पूजा होती है. किवदंती है कि आदि काल में स्थित मंदिर के पुजारी की पुत्री के रूप में अवतरित माता कन्या की आयु में ही यहीं पर तब अंतर्ध्यान हो गयी थीं जब मंदिर अचानक ध्वस्त हो गया था. तभी से माता को यहां पिंडी के रूप स्थापित कर उनकी आराधना की जाने लगी. वैशाख माह के अलाव भादो माह के पूर्णिमा और माघ माह के पूर्णिमा के दिन यहां पूजा के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. भीड़ के कारण ही यहां एक दिवसीय मेला भी लगता है. इस मंदिर का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है.

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