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बांस के बर्तन बनाने वाले कोहवरा टांड़ के महादलितों को सरकारी सहायता का इंतजार

Updated at : 11 Oct 2025 9:30 PM (IST)
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बांस के बर्तन बनाने वाले कोहवरा टांड़ के महादलितों को सरकारी सहायता का इंतजार

प्रखंड के रामचंद्रडीह पंचायत स्थित कोहवरा टांड़ गांव के महादलित मोहली समुदाय के लोगों की जिंदगी आज भी बांस के बनाये बर्तनों पर ही टिकी है.

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-हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी दो जून की रोटी जुटाना बनी हुई है चुनौती

-महाजनों से कर्ज लेकर लाते हैं बांस और करते हैं बर्तनों का निर्माण

जयकुमार शुक्ला,

चकाई

प्रखंड के रामचंद्रडीह पंचायत स्थित कोहवरा टांड़ गांव के महादलित मोहली समुदाय के लोगों की जिंदगी आज भी बांस के बनाये बर्तनों पर ही टिकी है. पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को ये लोग आज भी जीविका का साधन बनाये हुए हैं. बांस से तैयार दोउरा, डाली, सूप, मौनी और पंखा आदि की ग्रामीण बाजार में खूब मांग है. त्योहारों, खासकर छठ महापर्व में तो इनके बनाये बर्तनों की मांग और भी बढ़ जाती है. मान्यता है कि मोहली समाज के हाथों से बने बर्तन शुद्ध और पवित्र माने जाते हैं, इसलिए छठ पूजा में लोग विशेष रूप से इन्हीं से बांस के बर्तन की खरीदारी करते हैं.

न सरकारी मदद, न बैंक से कर्ज

कोहवरा टांड़ निवासी राजेश मोहली, बुधन मोहली समेत कई कारीगर बताते हैं कि आज तक उन्हें किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता या बैंक से लोन नहीं मिल सका है. मजबूरी में हमलोग महाजनों से कर्ज लेकर बांस खरीदते हैं और फिर उससे बर्तन बनाते हैं. दिन-रात मेहनत के बाद भी जो थोड़ी बहुत कमाई होती है, वह भी महाजन का कर्ज चुकाने में चली जाती है.

कारीगरों का कहना है कि उन्होंने कई बार सरकारी कर्ज के लिए आवेदन दिया, बैंक के चक्कर भी काटे, लेकिन निजी संपत्ति के अभाव में बैंक लोन देने को तैयार नहीं हुए. यदि सरकार से कर्ज या अनुदान के रूप में मदद मिल जाती, तो पीढ़ियों से जारी काम करना आसान हो जाता और कुछ बचत भी हो पाती.

व्यापारी कमा रहे मुनाफा, कारीगर रह गये पीछे

स्थानीय बाजार में बांस के बने बर्तनों की डिमांड को देखते हुए झाझा, सोनो, बटिया जैसे इलाकों से व्यापारी कोहवरा टांड़ पहुंचते हैं और इन कारीगरों से ओने-पौने दामों पर बर्तन खरीद लेते हैं. व्यापारी तो अच्छा मुनाफा कमा लेते हैं, लेकिन असली मेहनत करने वाला मोहली समाज के लोग आज भी मुफलिसी और अभाव में जीने को मजबूर हैं.

क्या कभी बदलेगा भाग्य, बड़ा सवाल

पुश्तैनी हुनर, दिन-रात की मेहनत और गुणवत्तापूर्ण बर्तनों की बढ़ती मांग के बावजूद कोहवरा टांड़ के ये महादलित परिवार आज भी किसी तरह से अपना गुजर-बसर कर रहे हैं. सरकारी सहायता की बाट जोह रहे हैं. सरकारी योजनाओं की रोशनी कब तक यहां पहुंचेगी, यह बड़ा सवाल बन गया है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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PANKAJ KUMAR SINGH

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By PANKAJ KUMAR SINGH

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