जेल से रिहा हुए माओवादी नेता विजय कुमार आर्य
Updated at : 20 Sep 2018 7:59 AM (IST)
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गया : किसी जमाने में देश भर में नक्सली- माओवादी आंदोलन की रीढ़ माने जानेवाले विजय कुमार आर्य सासाराम रिहा हो गये. माओवादियों के शीर्ष बुद्धिजीवियों में से एक और अंतरराष्ट्रीय माओवादी संगठन रीम और कम्पोसा के संस्थापकों में शामिल विजय कुमार आर्य को जेल में बंद रखने के लिए बिहार सरकार ने खूब कवायद […]
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गया : किसी जमाने में देश भर में नक्सली- माओवादी आंदोलन की रीढ़ माने जानेवाले विजय कुमार आर्य सासाराम रिहा हो गये. माओवादियों के शीर्ष बुद्धिजीवियों में से एक और अंतरराष्ट्रीय माओवादी संगठन रीम और कम्पोसा के संस्थापकों में शामिल विजय कुमार आर्य को जेल में बंद रखने के लिए बिहार सरकार ने खूब कवायद की थी.
यहां तक कि लंबे समय तक बिहार सरकार ने आंध्र प्रदेश में चल रहे एक मामले में विजय आर्य को प्रोड्यूस नहीं किया, ताकि न तो मामला खत्म हो और न ही वह रिहा हो सकें. लेकिन, एक के बाद एक कानूनी लड़ाई जीतने के बाद विजय आर्य बीते 13 सितंबर को रिहा कर दिये गये.
कोंच के करमा गांव के हैं रहनेवाले
कोंच प्रखंड के करमा गांव के रहनेवाले विजय आर्य को 30 अप्रैल 2011 को कटिहार जिले के बारसोई इलाके से पुलिस ने गिरफ्तार किया था. इनके साथ माओवादी संगठन के सेंट्रल कमेटी के सुब्रहण्यम, पुलेंदु शेखर मुखर्जी भी पकड़े गये थे. उस समय विजय आर्य सहित उनके साथियों पर बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, छतीसगढ़, पश्चिम बंगाल व पंजाब में नक्सली गतिविधियों से संबंधित प्राथमिकी दर्ज थी.
गिरफ्तार के वक्त बिहार सरकार ने विजय आर्य को लेकर इतनी सजग थी कि उसने उन्हें भागलपुर सेंट्रल जेल के तृतीय खंड में हाइ सिक्योरिटी में रखा गया था. विजय आर्य के खिलाफ कुल 14 मामले दर्ज थे. सरकार की नजर में विजय आर्य इतने बड़े नक्सली नेता थे कि उनकी गिरफ्तारी के लिए 30 लाख रुपये इनाम की घोषणा की थी. गिरफ्तारी के बाद पुलिस पर दबाव इस कदर था कि वह उन्हें सड़क मार्ग से ले जाने से बचती थी. लेकिन, तमाम तामझाम के बावजूद सरकार उनके खिलाफ एक भी मामले में सबूत अदालत में पेश नहीं कर सकी.
करीब सात साल चार महीने बाद विजय आर्य को रिहाई मिली.
लोकसभा चुनाव के पहले विजय आर्य की रिहाई से राजनीति में उबाल आने की संभावना
बहरहाल, लोकसभा चुनाव के ठीक पहले विजय आर्य की रिहाई से बिहार की राजनीति में उबाल आने की संभावना बढ़ सकती है. यह देखना दिलचस्प होगा कि उनका अगला कदम क्या होगा? क्या वह फिर से माओवादी संगठनों को मजबूत करेंगे या फिर वे चुनावी रणनीति की दिशा में आगे बढ़ेंगे?
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