मां चामुंडा ने इस जगह किया था चंड-मुंड का वध, पूर्व पीएम चंद्रशेखर और लालू यादव ने भी की है यहां पूजा

Updated at : 04 Oct 2022 11:54 AM (IST)
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मां चामुंडा ने इस जगह किया था चंड-मुंड का वध, पूर्व पीएम चंद्रशेखर और लालू यादव ने भी की है यहां पूजा

मां चामुंडा मंदिर में अष्टमी पूजा के मौके पर भक्तों की भीड़ उमड़ी. यह उपशक्तिपीठ है. मां भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं. यहां पूजा पूर्व पीएम चंद्रशेखर और लालू यादव ने भी की है.

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मुजफ्फरपुर. जिले के कटरा प्रखंड मुख्यालय स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां चामुंडा मंदिर में अष्टमी पूजा के मौके पर भक्तों की भीड़ उमड़ी. यह उपशक्तिपीठ है. मां भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं. शक्तिपीठ की प्रसिद्धि सुनकर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में मां की पूजा अर्चना करने पहुंचे थे. पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव समेत कई बड़े राजनेता यहां पहुंच कर मां का दर्शन कर चुके हैं.

जनक राजवंश की कुलदेवी थी मां चामुंडा

कहा जाता है कि आदिकाल में जनक सिरध्वज के भाई जनक कुशध्वज की यह राजधानी थी. उन्हीं की कुल देवी मां चामुंडा थी. 85 एकड़ में फैले इस गढ़ के उत्तर दिशा में मंदिर स्थित है. अति प्राचीन नाम गढ़ चांन परगना बताया जाता है. प्रमाण के रूप में 1972 में खुदाई में प्राप्त ताम्रपत्र के आधार पर प्रमाणित हो चुका है. यहां के अंतिम शासक चांद सेन थे, जिनकी मृत्यु मंत्री के दगा देने के कारण आत्महत्या करने के कारण हो गयी.

तुलसी के पौधे जुड़ी है कहानी

किवदंती है कि राजा आक्रमणकर्त्ता राजा से युद्ध करने के लिए गये थे. जाने के क्रम में अपनी रानी को बता कर गये कि आंगन में जो तुलसी का पौधा है वह अगर मुरझा जाए तो यह समझ लेना कि राजा मारा गया. यह बात किसी तरह मंत्री को पता चल गयी. मंत्री दुश्मन राजा से मिलकर रात्रि में ही तुलसी के पौधे को जड़ से काट दिया. सुबह जब रानियों द्वारा मुरझाया गया तुलसी का पौधा देखा गया तो सुबह में ही रानियों ने जौहर कर प्राण त्याग दी. युद्ध के पश्चात राजधानी पहुंचने पर अपने परिजनों को न देखकर राजा ने भी अग्नि में कूद कर प्राण त्याग दिया जिसका प्रमाण खुदाई के क्रम में जले हुए अवशेष के मिलने से प्राप्त होता है.

इसी जगह चंड, मुंड नामक असुर का किया था वध

कहा जाता है कि मां चामुंडा ने इसी जगह चंड, मुंड नामक असुर का वध की थी. इसका प्रमाण के रूप में मंदिर के उत्तर दिशा में बागमती व लखनदेई नदी के किनारे से हिमालय तक फैला हुआ जंगल रहा होगा. सुनील कुमार चौधरी ने कहा कि प्राचीन स्थल होने के पश्चात भी इस क्षेत्र का समुचित विकास नहीं हो सका. मंदिर न्यास बोर्ड के अध्यक्ष रघुनाथ चौधरी ने कहा कि भक्तों के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है. पुजारी मुरारी झा ने कहा कि मां का पूजा तो प्रतिदिन की जाती है. वैसे विशेष रूप सोमवार, बुद्धवार व शुक्रवार को पूजा का विशेष महत्व है.

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