Darbhanga: चक्रव्यूह से जूझ रहे पात्रों के अंतर्द्वंद्व का साक्षात्कार कराता दस जमा सात कहानी संग्रह

सेवानिवृत्त सहायक प्राध्यापक श्याम भास्कर लिखित पुस्तक `दस जमा सातʼ (कथा-संग्रह) का विमोचन किया गया
दरभंगा. एमएमटीएम कॉलेज में हिन्दी विभाग एवं आइक्यूएसी की ओर से सेवानिवृत्त सहायक प्राध्यापक श्याम भास्कर लिखित पुस्तक `दस जमा सातʼ (कथा-संग्रह) का विमोचन किया गया. लनामिवि के पीजी हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ प्रभाकर पाठक की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में बतौर मुख्य वक्ता एमएलएसएम कालेज के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ सतीश कुमार सिंह ने कहा कि श्याम भास्कर ने ”””””””” दस जमा सात”””””””” की कहानियों में परिस्थितियों की प्रतिकूलताओं के चक्रव्यूह से जूझ रहे पात्रों के अंतर्द्वंद्व को मनोवैज्ञानिक आधार देकर उस यथार्थ को प्रत्यक्षीकृत किया है, जो सामने होकर भी अक्सर अनजाना रह जाता है. इस दृष्टि से संकलन की ””कुआं””, ””क्रांति के पहले””, भींगी वह रात””, ””छुटकारा””, ””जिंस वाली लड़की””,
””मूर्ति””आदि कहानियां बरबस ध्यान आकृष्ट करती हैं. कहानीकार ने अपनी कहानियों में मानवीय संवेदना के बहुविध रूपों को सामने लाकर सार्थक विमर्श की ठोस भूमिका तैयार की है. और सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि श्याम भास्कर ने दूर की कौड़ी लाने से परहेज करते हुए अपनी कहानियों में उस यथार्थ को ही रूपायित किया है, जो उनके अपने समाज का, अपने परिवेश का और अपने समय का है. इसीलिए ये कहानियां विश्वसनीय और प्रामाणिक बन पड़ी हैं. इन कहानियों के गढ़न में प्रेमचंद की झलक मिलती है, तो भाषिक विन्यास बरबस नागार्जुन का स्मरण कर देता है. किसी कहानीकार के पहले संग्रह में कथात्मक विन्यास का ऐसा कौशल, बिंब और प्रतीकों की सधी हुई कारीगरी, शिल्प विधान की ऐसी कसावट देख सुखद आश्चर्य होता है.वंचित समुदायों के जीवन का चित्रण प्रस्तुत करती कहानियां
डॉ अमर कांत कुमर ने कहा कि ये कहानियां मिथिला और सम्पूर्ण हिंदुस्तान के वंचित समुदायों के जीवन का चित्रण प्रस्तुत करती हैं. डॉ सत्येन्द्र कुमार झा ने कहा कि कहानियों के माध्यम से लेखक ने वर्तमान व्यवस्था पर भी चोट की है. इन कहानियों में मनोवैज्ञानिक आधार पर मानव मूल्यों को व्यक्त किया गया है. डॉ प्रभाकर पाठक ने लेखक को लेखन की विशिष्ट और यथार्थवादी शैली के लिये बधाई दी. नया नियोग कहानी की विशेष रूप से चर्चा की. कहा कि लेखक ने इसमें मनुष्य की गिरती हुई मानसिकता को व्यक्त किया है. प्रारंभ में अजीत कुमार वर्मा ने लेखक को आशीर्वचन दिया. संचालन डॉ राज किशोर झा एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रधानाचार्य डॉ उदय कांत मिश्र ने किया. मौके पर डॉ उमेश कुमार, डॉ कृष्ण कुमार, डॉ पारुल बनर्जी, प्रो. प्रेम मोहन मिश्र, अमरेश्वरी चरण सिंहा, वंदना चौधरी, नीतू झा, प्रवीण कुमार झा, डॉ महेश ठाकुर, डॉ भागीरथ चौधरी, अजय किशोर झा, शिशिर कुमार कर्ण, संजय कुमार, राकेश कुमार नंदन, हरि किशोर चौधरी, नाजनी, जय कुमार, यश चौधरी, हेमेंद्र लाभ आदि माैजूद रहे.
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