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Darbhanga News: हिंदी राष्ट्रभक्ति की ओर ले जाने वाली भाषा: प्रो. एसके चौधरी

Updated at : 10 Jan 2026 10:24 PM (IST)
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Darbhanga News: हिंदी राष्ट्रभक्ति की ओर ले जाने वाली भाषा: प्रो. एसके चौधरी

Darbhanga News:‘हिंदी का वर्तमान भारतीय संदर्भ और वैश्विक परिप्रेक्ष्य’ विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन के मौके पर कुलपति प्रो. संजय कुमार चौधरी ने कहा कि हिंदी राष्ट्रभक्ति की ओर ले जाने वाली भाषा है.

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Darbhanga News: दरभंगा. विश्व हिंदी दिवस पर पीजी हिंदी विभाग की ओर से शनिवार को पीजी वाणिज्य विभाग के सभागार में ‘हिंदी का वर्तमान भारतीय संदर्भ और वैश्विक परिप्रेक्ष्य’ विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन के मौके पर कुलपति प्रो. संजय कुमार चौधरी ने कहा कि हिंदी राष्ट्रभक्ति की ओर ले जाने वाली भाषा है. इसके माध्यम से भारत के विभिन्न राज्य आपस में जुड़ते हैं. विगत 34 वर्षों बाद लागू हुई नयी शिक्षा नीति के जरिए अब शिक्षा को भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्ध परंपरा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें हिन्दी की भूमिका निर्विवाद है. उन्होंने कहा कि हमारा राष्ट्र हिंदी के माध्यम से ही अपनी सर्वश्रेष्ठ स्थिति को प्राप्त कर विश्व गुरु के पथ की ओर अग्रसर हो सकता है. अध्यक्षता करते हुए पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. प्रभाकर पाठक ने कहा कि हिन्दी विक्रय की भाषा नहीं बल्कि क्रय की भाषा है. वह व्यापार की भाषा हो सकती है लेकिन उसकी सांस्कृतिक व सामाजिक महत्ता इससे कहीं अधिक ऊंची है. विषय प्रवेश कराते हुए पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. चंद्रभानु सिंह ने कहा कि भारत में अंग्रेजी और हिन्दी का जो भाषिक द्वैत है, वह हमारे समाज के वर्गीय चरित्र को दर्शाता है. भले ही कामकाज और अन्य क्षेत्रों में हिन्दी को और आगे बढ़ना है, लेकिन रचनात्मकता के स्तर पर हिन्दी का सम्यक एवं द्रुत विकास हुआ है. प्रो. सिंह ने कहा कि हिन्दी सेवा में प्रवासी व विदेशी मूल के लेखकों का भी अहम योगदान रहा है. उन्हें भी हिन्दी की मुख्यधारा में लाना अपेक्षित है. मुख्य अतिथि रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. रविभूषण ने कहा कि वर्तमान समय में हिंदी के समक्ष बड़ी चुनौतियां हैं. हिंदी की समासिकता को समझने के लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि इसे राष्ट्रभाषा बनाने की मांग सर्वप्रथम हिंदी एतर भाषी राज्यों जैसे महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से उठी, लेकिन आज हिन्दी की बोलियां ही हिन्दी से अपना सम्बन्ध तोड़ रही हैं. कई संस्थाओं की स्वायत्तता समाप्त हो रही हैं. इन कारणों की पड़ताल आवश्यक है. अतिथि वक्ता एचसीयू के प्राध्यापक प्रो. चंद्रकांत सिंह ने कहा कि हिन्दी भारतीय समाज की ज्ञानात्मक संवेदना का प्रतिनिधित्व करती है. रामचरितमानस से लेकर उदय प्रकाश, विष्णु खरे आदि की रचनाओं का विश्वभर में अनुवाद यह दर्शाता है कि हिन्दी का प्रभाव वैश्विक ज्ञान-क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है. सेमिनार में ऑनलाइन मॉरिशस की हिन्दी साहित्यकार सुरीति रघुनंदन, त्रिभुवन विश्वविद्यालय, नेपाल के साहित्यकार डॉ विनोद कुमार विश्वकर्मा आदि ने भी विचार रखे. मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. मंजू राय ने कहा कि हिन्दी आत्मगौरव की भाषा है. विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने कहा कि हिन्दी के स्वरूप में निरंतर बदलाव हो रहा है, जिसे गहराई से समझना वर्तमान समाज को आवश्यक है. संचालन करते हुए डॉ सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि हिन्दी अपने लोगों के बल पर पूरी दुनिया में चल रही है. दूसरे सत्र का संचालन डॉ मंजरी खरे तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ महेश प्रसाद सिन्हा ने किया. मौके पर डॉ कमल किशोर वर्मा, डॉ धर्मेन्द्र दास, डॉ गजेन्द्र भारद्वाज, डॉ वीरेन्द्र कुमार दत्ता, डॉ अभिमन्यु कुमार, डॉ दीपक कुमार दास, वाणिज्य विभागाध्यक्ष डॉ राजकुमार साह, डॉ श्याम कुमार, हीरालाल सहनी आदि मौजूद थे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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