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प्रकृति के साहचर्य का प्रतीक पर्व मकरसंक्रांति कल, तैयारी में जुटे लोग

समाज को एक सूत्र में पिरोने का संदेश देनेवाला महत्वपूर्ण पर्व मकरसंक्रांति 14 जनवरी को है.

दरभंगा. प्रकृति में होनेवाले बदलाव के अनुरूप खुद को ढालने के साथ समाज को एक सूत्र में पिरोने का संदेश देनेवाला महत्वपूर्ण पर्व मकरसंक्रांति 14 जनवरी को है. प्रत्यक्ष देवता सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण होंगे. इसके साथ ही शुभकाल भी शुरू हो जायेगा. इस पर्व को परंपरानुरूप मनाने की तैयारी में पूरा श्रद्धालु समाज जुटा है, लिहाजा बाजार भी तैयार है. दुकानों में प्राय: सालभर पीछे से झांकनेवाले तिल, गुड़, चूरा, मुरही आदि सामने आ गये हैं, वहीं रेडिमेड लाइ, तिलकुट आदि की दुकानें भी जगह-जगह सजी हैं. फेरी लगा लाइ बेचनेवालों की गूंज अहले सुबह से गलियों में सुनाई पड़ रही है. इस पर्व को लेकर घर की महिलाओं की जहां व्यस्तता बढ़ गयी है, वहीं बच्चों में अभी से उत्साह नजर आ रहा है. गुड़ की मिठास के साथ कुरकुरे तिल, मुरही व चूरा के लाइ संग दही व विभिन्न व्यंजन को मिलाकर तैयार स्वादिष्ट खिचड़ी का स्वाद लेने के लिए मचल रहे हैं. बता दें कि इस अवसर पर दिन में चूरा-दही व लाइ आदि खाने की परंपरा है तो रात में खिचड़ी, तरुआ आदि खाने का चलन है.

गर्म तासीर वाले खाद्य पदार्थ ग्रहण करने की परंपरा

मकर संक्रांति पूर्व कई मायने में खास है. यह प्रकृति के साहचर्य का संदेश देता है. विज्ञान के अनुसार मौसम में होनेवाले परिवर्त्तन के अनुरूप शरीर को तैयार करना जरूरी होता है. मकर संक्रांति के दिन से दिन बड़ी व रातें छोटी होनी आरंभ हो जाती है. सूर्य के उत्तरायण होने की वजह से गर्मी बढ़नी शुरू हो जाती है. इस के अनुरूप शरीर को तैयार करने के लिए ही इस पर्व के मौके पर तिल, गुड़, चूरा, दही, मुरही, खिचड़ी आदि गर्म तासीर वाले खाद्य पदार्थ ग्रहण करने की परंपरा बनायी गयी है.

दान की प्राधनता

इस पर्व में दान की प्रधानता है. लोग अपनी क्षमता के अनुसार दान करते हैं. विभिन्न तरह की लाइ के अलावा खिचड़ी दान किया जाता है. गरीबों के बीच गर्म कपड़े भी दान करने की परंपरा है. इसकी तैयारी अभी से लोगों ने शुरू कर दी है. यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन श्यामाधाम से लेकर दरभंगा जंक्शन के समीप शनिदेव मंदिर, लहेरियासराय महावीर मंदिर आदि स्थानों पर बड़ी संख्या में लोग दान करने पहुंचते हैं.

पांच तरह से तिल के प्रयोग का विधान

मकर संक्रांति में तिल की प्रधानता है. यही वजह है कि इसे मिथिला में तिला संक्रांति या तिल संक्रांति भी कहा जाता है. शास्त्रों में इस तिथि का विशेष महत्व बताया गया है. इस दिन पूजन-दान करने के साथ पुण्य स्नान करने का विधान है. मान्यता है कि पुण्य स्नान करने से मनोवांक्षित फल की प्राप्ति होती है. ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है. इस अवसर पर तिल के पांच तरह से प्रयोग का विधान शास्त्रों में किया गया है. विश्वविद्यालय पंचांग के संपादक सह संस्कृत विवि के पूर्व कुलपति पं. रामचंद्र झा बताते हैं कि इस अवसर पर पांच तरह से तिल का प्रयोग करना चाहिए. तिल स्नान, तिल पूजन, तिल से हवन, तिल दान व तिल ग्रहण करने का विधान है.

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