भारतीय चिकित्सा व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानक पर स्थापित करने का खोला दरवाजा

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 16 Jun 2019 1:45 AM

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आधुनिक चिकित्सा पद्धति में लाने की कोशिश पद्मश्री डॉ मोहन मिश्र ने डिमेंशिया रोग के उपचार में ब्राह्मी को किया स्थापित दरभंगा : कालाजार रोग के समूल नाश में महत्ती भूमिका निभाने तथा आर्सेनिक युक्त पानी के शुद्धीकरण के क्षेत्र में ऐतिहासिक अवदान के कारण पद्मश्री से विभूषित प्रख्यात चिकित्सक डॉ मोहन मिश्र ने चिकित्सा […]

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आधुनिक चिकित्सा पद्धति में लाने की कोशिश

पद्मश्री डॉ मोहन मिश्र ने डिमेंशिया रोग के उपचार में ब्राह्मी को किया स्थापित
दरभंगा : कालाजार रोग के समूल नाश में महत्ती भूमिका निभाने तथा आर्सेनिक युक्त पानी के शुद्धीकरण के क्षेत्र में ऐतिहासिक अवदान के कारण पद्मश्री से विभूषित प्रख्यात चिकित्सक डॉ मोहन मिश्र ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक और पहल की है. भारतीय चिकित्सा पद्धति को वेस्टर्न मेडिसीन सिस्टम में स्वीकार्यता के लिए शोध कर बंद दरवाजे को खोलने का सफल प्रयास किया है.
शनिवार को अपने आवास पर मीडिया से बात करते हुए डॉ मिश्र ने कहा कि ब्राह्मी के उपयोग से डिमेंशिया यानी भूलने की बीमारी का शर्तिया इलाज अपने देश में सदियों से होता आ रहा है, लेकिन दवा की आधुनिक प्रणाली में प्रवेश के लिए सख्त प्रोटोकॉल का अनुपालन करना होता है.
इसके लिए रोगियों की अल्प संख्या के साथ पायलट स्टडी करनी होती है. इस मानक को ध्यान में रखते हुए उन्होंने दर्जन भर रोगियों पर इस हर्बल का प्रयोग किया जो कि सफल रहा. उनके इस कार्य को पिछले वर्ष 25-26 जून को लंदन में रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियन के इनोवेशन इन मेडिसीन सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया था. यह अध्ययन डब्ल्यूएचओ की प्राथमिक रजिस्टर में पंजीकृत है. उनका यह पेपर अब रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियन्स के फ्यूचर हेल्थ केयर जर्नल में प्रकाशित हुआ है.
उन्होंने कहा कि पश्चिमी चिकित्सा पद्धति के बंद दरवाजों को तोड़ने की उनकी यह छोटी कोशिश है. ब्राह्मी को आधुनिक चिकित्सा में लाने का पहला कदम है. उस शोध में उनके साथ डॉ अजय कुमार मिश्र एवं डॉ उदभट मिश्र शामिल थे. उन्होंने कहा कि अलजाइमर रोग डिमेंशिया गंभीर बीमारी है. देश में करीब 40 लाख लोग इससे पीड़ित हैं. विश्व स्तर पर यह आंकड़ा चार करोड़ से अधिक है. यह प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है. दुनिया के प्रमुख दवा कंपनियों ने हाथ खड़े कर लिये, लिहाजा इसका उपचार आधुनिक चिकित्सा पद्धति में नहीं है.
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