होलिका दहन आज, चढ़ी होली की खुमारी, होली कल

Updated at : 16 Mar 2014 2:07 AM (IST)
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होलिका दहन आज, चढ़ी होली की खुमारी, होली कल

मोतिहारीः होली सामाजिक समरसता व एकता का महा पर्व है. इस त्योहार में वर्ग अथवा जाति भेद का कोई स्थान नहीं है. वैदिक काल में इस पर्व को नवाóोष्टि यज्ञ कहा जाता था. यह त्योहार नयी फसल के आने का सूचक है. होली की राख तथा सेंके हुये बालियों को घर लाकर मुख्य द्वार के […]

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मोतिहारीः होली सामाजिक समरसता व एकता का महा पर्व है. इस त्योहार में वर्ग अथवा जाति भेद का कोई स्थान नहीं है. वैदिक काल में इस पर्व को नवाóोष्टि यज्ञ कहा जाता था. यह त्योहार नयी फसल के आने का सूचक है. होली की राख तथा सेंके हुये बालियों को घर लाकर मुख्य द्वार के समीप स्थापित करने से घर के विभिन्न रोग एवं दोष दूर हो जाते हैं.

अगले दिन सुबह में होली की भस्म को माथे पर लगाने का भी विधान हैं. इस पर्व को नव संवत्सर का आरंभ तथा वसंतागमन के उपलक्ष्य में किया जाने वाला यज्ञ भी माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस पर्व का संबंध काम दहन से भी है. जब शंकर जी ने अपनी क्रोधागिA से कामदेव को भस्म कर दिया था. तभी से इस त्योहार का प्रचलन हुआ.

पुराणों के अनुसार होली देवी देवताओं का भी प्रिय पर्व है रहा है. विष्णु पुराणों के अनुसार प्रमुख तौर पर यह त्योहार प्रह्लाद से संबंधित है. ऐसी मान्यता है कि अट्टहास किलकारियों तथा मंत्रोच्चर से पापात्मा राक्षसों का नाश हो जाता है. इसलिये होलिका दहन के समय सभी उचें स्वर में अट्टाहस व किलकारियां मारकर होलिका के चारों ओर झूम झूमकर नृत्य करते हैं.

सूर्य के प्रकाश में अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष तक फैला प्रत्येक रंगा विधाता की कल्पना का प्रमाण है. हरा रंग समृद्धि, विकास तथा पुनमरुवारण का उद्घोष करना है. तो पीला या केसरिया कल्पना ज्ञान व बुद्धि की शक्ति को दर्शाता है. लाल रंग कर्मयोग के उल्लास को झलकता है. मगर काला रंग तमासिक प्रवृति का प्रतीक है. अत: होली के अवसर काले रंग का उपयोग बिल्कुल न करें. इस दिन आम्र मंजरी तथा चंदन मिलाकर खाने का मड़ा ब्रहात्म्य है. इस वर्ष 16 मार्च रविवार को रात्रि 10:16 से पूर्व होलिका दहन तथा अगले दिन 17 मार्च सोमवार को रंगोत्सव अर्थात होली का महापर्व मनाया जायेगा. इस वर्ष मिथुन, कन्या, वृश्चिक और मीन राशि वालों के लिये तथा नव विवाहिता स्त्री के लिये होलिका दहन देखना वजिर्त है. उक्त बातें आर्ष विद्या शिक्षण प्रशिक्षण संस्थान के प्राचार्य व वेदाचार्य सुशील कुमार पांडेय ने कही.

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