मोतिहारी : जे विकास करी, ओकरे वोट देम

Updated at : 15 Oct 2015 1:23 AM (IST)
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मोतिहारी : जे विकास करी, ओकरे वोट देम

महात्मा गांधी की कर्मभूमि पूर्वी चंपारण की 12 सीटों पर मतदान चौथे चरण में एक नवंबर को होना है. प्रत्याशी मैदान में उतर चुके हैं. अगले दो दिनों में मुकाबले की तसवीर बहुत हद तक साफ हो जायेगी. इस बीच, जिले में चुनाव का शोर धीरे-धीरे तेज होने लगा है. सड़कों पर राजनीतिक दलों के […]

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महात्मा गांधी की कर्मभूमि पूर्वी चंपारण की 12 सीटों पर मतदान चौथे चरण में एक नवंबर को होना है. प्रत्याशी मैदान में उतर चुके हैं. अगले दो दिनों में मुकाबले की तसवीर बहुत हद तक साफ हो जायेगी. इस बीच, जिले में चुनाव का शोर धीरे-धीरे तेज होने लगा है.

सड़कों पर राजनीतिक दलों के झंडे लगी गाड़ियां दिखने लगी हैं. विश्व को शांति का संदेश देनेवाले बुद्ध का सबसे बड़ा स्तूप चंपारण के केसरिया में है. पूर्वी चंपारण की की चुनाव की ताजा स्थिति पर नजर डालती मुजफ्फरपुर संस्करण के संपादक शैलेंद्र ने.

मूल को छोड़कर जो डाल खोजता है, वह भटकता है- मोतिहारी के महात्मा गांधी संग्रहालय में लगे राष्ट्रपिता बापू के इस कथन में वर्तमान लोकतंत्र व उसकी आत्मा कहे जानेवाले चुनाव का सार निहित है. दल कैसे आम आदमी की दुश्वारियों को छोड़ कर राजनीतिक ध्रुवीकरण में लगे हैं, इसकी बनागी संग्राहलय के सचिव ब्रज किशोर सिंह के उस बयान में भी देख सकते हैं, जिसमें वे राजनीतिक दलों के नफा-नुकसान की बात करते हैं. 80 साल से ज्यादा के ब्रज किशोर राजनीति के उस दौर की भी बात करते हैं, जब नेता उसूलों पर चलते थे, लेकिन स्थितियां बदल गयी हैं.

अब जाति जमात की बात होने लगी है. ये भी दौर ज्यादा दिन तक चलनेवाला नहीं लगता, क्योंकि गांधी संग्राहलय से कुछ सौ मीटर की दूरी पर मीना बाजार है. खरीदारी करने पहुंचे रामदीन ठेठ अंदाज में कहते हैं, जे विकास करी, ओकरे वोट देम. जाति-पाति, लबरई के बाजार (झूठ के चक्कर) में हमनी के ना पड़ेब. इ सब बहुत दिन भइल.

रामदीन का बयान क्या बदलती राजनीति का आइना है, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को अपना चेहरा देखना चाहिए. इसी उधेड़बुन में हम आगे बढ़ते हैं, तो मुलाकात केबीसी में पांच करोड़ जीत कर चंपारण का नाम रोशन करनेवाले सुशील कुमार से होती है.

इन्हें आयोग की ओर से वोटिंग बढ़ाने के लिए जिले का आइकन भी बनाया गया है. सुशील इन दिनों इसी काम में लगे हैं. कहते हैं, माहौल बदला है. लोग अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रहे हैं. इसी का नतीजा है कि वोटिंग का प्रतिशत चुनाव दर चुनाव बढ़ रहा है. सुशील राजनीतिक सवालों के जवाब देने से बचते हैं, लेकिन मोतिहारी चैंबर ऑफ कामर्स के सचिव संजय खुल कर बोलते हैं. कहते हैं कि स्थितियां कुछ दिनों में बदली हैं.

संजय शहर के बड़े व्यापारी हैं और गैर राजनीतिक संगठनों से भी जुड़े हैं. इनकी चिंता हाल के दिनों में बढ़े अपराध के आकड़े हैं. कहते हैं, हमारी चिंता यही है. हमारा परिवार अपराध से प्रभावित रहा है. रंगदारी के लिए संजय के पिता व चाचा की हत्या हुई थी. इसका दर्द अब भी इनकी बातों में दिखता है.

कहते हैं, हम ऐसी सरकार चाहते हैं, जिसमें प्रशासन व्यवसायियों का सहयोग करे. बर्तन की बड़ी दुकान चलानेवाले रोहित कुमार साह कहते हैं कि जो काम हो रहा है, उससे वह संतुष्ट हैं. किसी तरह की परेशानी है. अभी माहौल व्यापार के अनुकूल है. बिना किसी बाधा के व्यापार कर रहे हैं.

शहर के बलुआ चौक पर रामबाबू प्रसाद व रवींद्र नाथ तिवारी के बीच चुनाव पर तीखी चर्चा हो रही है. दोनों जोर-जोर से अपनी बात कह रहे हैं. लगता है लड़ाई हो रही है, लेकिन दोनों ही लोगों के कहने का मतलब एक ही था. किसी खास राजनीतिक दल को वोट देने की हिमायत कर रहे हैं.

कहते हैं, हमारा लाग-लपेट नहीं है, लेकिन हालत बदलनी ही चाहिए. हम ऐसा करेंगे. किसी राजनीतिक दल से कोई उम्मीद नहीं है. इसके बाद दोनों लोग 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान लहर की बात करने लगते हैं.

नगर परिषद के उपाध्यक्ष रह चुके समाजसेवी विभूति नारायण सिंह केंद्रीय विश्वविद्यालय का मुद्दा उठाते हैं. कहते हैं, विश्वविद्यालय का काम जल्दी शुरू हो, हमलोग चाहते हैं, लेकिन ये मुद्दा ठंडे बस्ते में जाते हुए दिख रहा है. चुनाव में राजनीतिक दलों के नेता इस पर बात नहीं कर रहे हैं, जबकि ये प्रमुख मुद्दों में एक है.

वे अधिकारियों के साथ उन किसानों की बैठक की बात भी बताते हैं, जो भूमि अधिग्रहण को लेकर हुई थी. कहते हैं, किसान विश्वविद्यालय के लिए जमीन देने को तैयार हैं, लेकिन अभी तक पहल नहीं हो सकी है. इस पर जल्दी काम होना चाहिए. विभूति साथ ही राजनीतिक शुचिता की बात भी करते हैं. कहते हैं, राजनीतिक दलों के नेताओं में धैर्य नाम की चीज खत्म होती जा रही है. नेताओं में अब विवादित बयान देने की होड़ लगी है. ये करके वे लोगों को मूल मुद्दे से भटकाना चाहते हैं.

विभूति की बात का युवा व्यवसायी संजय कुमार भी समर्थन करते हैं. संजय गाड़ियों के व्यवसाय से जुड़े हैं. कहते हैं, हमने सर्विस सेक्टर को देखा है. लंबे समय तक नौकरी की है. अब पारिवारिक काम संभाल रहा हूं. अभी की जो परिस्थितियां हैं. उसमें जरूरी है कि उद्योग-धंधों को बढ़ाने की दिशा में पहल हो, ताकि बिहार को देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में शामिल हो सके. लेकिन ये माहौल बनता नहीं दिखाई दे रहा है. हम्लोग आपस में ही लड़ रहे हैं.

राजनीतिक दल व्यवस्था बनाने की जगह अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं. कोई आरक्षण का मुद्दा उठा रहा है, तो कोई जाति-धर्म की बात कह रहा है. इसमें मूल मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं. ठेकेदार चंद्रकांत की नजर राजनीतिक नफा-नुकसान पर लगी है. कहते हैं कि पहले चरण का वोट पड़ गया है. अब दूसरा चरण आनेवाला है. हमारी पैनी नजर वोटिंग के प्रतिशत पर है.

बिहार में बाजार है, उत्पाद नहीं

मोतिहारी जिले में एक समय पर चीनी मिलें थीं, लेकिन अब सुगौली जैसी इक्का-दुक्का मिलें ही चल रही हैं. बाकी पर ताला लगा हुआ है. मिलों को फिर से चालू करने की कोशिश शुरू हुई, तो कानूनी अड़चनों ने रास्ता रोक दिया. अन्य जिलों की तरह मोतिहारी में औद्योगिक क्षेत्र नहीं है. सीमा क्षेत्र रक्सौल में औद्योगिक क्षेत्र जरूर है, लेकिन वहां भी कोई खास काम नहीं होता है.

व्यवसायी संजय कहते हैं, औद्योगिक क्षेत्र होना चाहिए. ये इलाका कृषि उत्पादों का क्षेत्र है. इसलिए इससे जुड़े उद्योग हमारे यहां होने चाहिए. अगर ऐसा होगा, तो हमारे नवयुवकों को रोजगार मिलेगा. किसानों को लाभ मिलेगा. बाहर से लोग आयेंगे. सड़कों की स्थिति ठीक है. इससे माल लाने-ले जाने में परेशानी नहीं होती. संजय बाजार की बात करते हैं. कहते हैं कि अभी बिहार में बाजार है, लेकिन उत्पाद नहीं. हमलोग बाहर से सामान मंगवा कर यहां बेचते हैं

वहां व्यवस्था है, यहां व्यवस्था नहीं

सामाजसेवी विभूति नारायण हाल में चीन की यात्र से लौटे हैं. कहते हैं कि चीन की सड़कों पर मैंने ट्रैफिक सिपाही नहीं देखे. वहां पर क्रॉसिंग पर लगी लाइटों के सहारे ट्रैफिक कंट्रोल होता है, लेकिन अपने यहां पर बत्ती है. उसके बाद भी ट्रैफिक पुलिस लगानी पड़ती है. फिर भी लोग रेड लाइट जंप कर जाते हैं.

मेरे हिसाब से तो अपने यहां व्यवस्था ही नहीं है, जबकि चीन जैसे देशों की समृद्धि का राज यही है कि वहां पर व्यवस्था है. इससे हमें सीखना चाहिए. लेकिन, चुनाव में इन सब बातों की कोई चर्चा नहीं दिखती है.

उसूल छोड़ सब कुछ पर चल रहे नेता

80 साल से ज्यादा के ब्रज किशोर पुराने दौर की राजनीति को याद करते हैं. वह कहते हैं, पहले तो नेता उसूलों पर चलते थे. जनता के प्रति उनका सरोकार होता था. लेकिन, अब स्थितियां बदल गयी हैं. अब जाति जमात की बात होने लगी है. हमने ऐसे समय की उम्मीद नहीं की थी. हमें तो उम्मीद थी कि समाज बदलेगा.

मोतिहारी-रक्सौल सड़क चंपारण की दुखती रग

मोतिहारी से रक्सौल जानेवाली सड़क देश को अंतरराष्ट्रीय सीमा से जोड़ती है, लेकिन इस सड़क की हालत खराब है.

अप्रैल में जब भूकंप आया था, तो केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेद्र प्रधान ने इसको लेकर भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से बात की थी. उसके बाद हालात में कुछ सुधार आया है, लेकिन सड़क अभी तक नहीं बन सकी है. इसे चंपारण के लोगों की दुखती रग भी कह सकते हैं, क्योंकि इससे होकर कोई जल्दी गुजरना नहीं चाहता है.

ट्रक चालक राम निवास कहते हैं कि सड़क से गुजरना किसी भयावह एहसास से कम नहीं है.

जदयू/भाजपा राजद/लोजपा महागंठबंधन एनडीए

रक्सौल 48686 (भाजपा) 38569 (लोजपा) सुरेश कुमार (राजद) अजय कुमार सिंह (भाजपा)

सुगौली 36125 (भाजपा) 26642 (राजद) ओमप्रकाश चौघरी (राजद) रामचंद्र सहनी (भाजपा)

नरकटिया 31549 (जदयू) 23861 (लोजपा) डॉ शमीम अहमद (राजद) संत प्र कुशवाहा (रालोसपा)

हरसिद्बि 48130 (भाजपा) 30066 (राजद) विजय राम (राजद) कूष्णानंद पासवान (भाजपा)

गोविंदगंज 33859 (जदयू) 25454 (लोजपा) ब्रजेशा पांडेय (कांग्रेस) राजू तिवारी (लोजपा)

केसरिया 34649 (भाजपा) 22966 (सीपीआइ) डॉ राजेश कुमार (राजद) राजेंद्र गुप्ता (भाजपा)

कल्याणपुर 41163 (जदयू) 25761 (राजद) रजिया खातून (जदयू) सचिंद्र सिंह (भाजपा)

पीपरा 40099 (जदयूे) 28212 (राजद) क्रीम चंद्र (जदयू) श्यामबाबू यादव (भाजपा)

मघुबन 40478 (जदयू) 30356 (राजद) शिवजी राय (जदयू) इं. राणा रंधीर (भाजपा)

मोतिहारी 51888 (भाजपा) 27358 (राजद) विनोद श्रीवास्तव (राजद) प्रमोद कुमार (भाजपा)

चिरैया 39459 (भाजपा 24631 (राजद) लक्षमी ना यादव (राजद) लालबाबू प्रसाद (भाजपा)

ढाका 48100(स्वतंत्र) 46451 (जदयू) फैसल रहमान (राजद) पवन जायसवाल भाजपा)

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