क्या कहें, भैंस और गोबर में बीत रही जिंदगी

Updated at : 15 Oct 2015 1:10 AM (IST)
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क्या कहें, भैंस और गोबर में बीत रही जिंदगी

समस्तीपुर से रक्सौल जानेवाली पैसेंजर मुजफ्फरपुर से दस मिनट देर से खुली. कुछ पलों में ही ट्रेन स्पीड में आ जाती है. महिला-बाल विकास विभाग में काम करनेवाली साधना डिब्बे के अंदर आती हैं. बैग समेट कर बैठने की कोशिश करती हैं. इसी बीच उन्हें सहबाजपुर की रहनेवाली विभा दिख जाती हैं. उन्हें बुला लेती […]

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समस्तीपुर से रक्सौल जानेवाली पैसेंजर मुजफ्फरपुर से दस मिनट देर से खुली. कुछ पलों में ही ट्रेन स्पीड में आ जाती है. महिला-बाल विकास विभाग में काम करनेवाली साधना डिब्बे के अंदर आती हैं. बैग समेट कर बैठने की कोशिश करती हैं. इसी बीच उन्हें सहबाजपुर की रहनेवाली विभा दिख जाती हैं. उन्हें बुला लेती हैं. दोनों के बीच नवरात्र की बात शुरू हो जाती है.

कैसे जल्दी-जल्दी पूजा करके स्टेशन पहुंची, नहीं तो ट्रेन छूट जाती. दोनों एक-दूसरे को पूजा के शार्टकट तरीके भी बताने लगती हैं. इसी बीच सविता भी आ जाती हैं. तीनों को मोतीपुर जाना है. बातचीत का सिलसिला शुरू होता है, तो साधना कहती हैं, हम लोगों ने मतदाता जागरूकता रैली निकाली है. गांव में जहां जाते हैं, वहां लोगों से वोट देने की अपील कर रहे हैं. हम भी वोट डालेंगे.

चुनाव चर्चा का सिलसिला आगे बढ़ता है. साधना कहती हैं कि सबकी चाहत होती है कि विकास के नाम पर वोट पड़े. हम भी यही चाहते हैं. इसी बीच अचानक बोल पड़ती हैं, बेरोजगारी से बड़ा कोई मुद्दा नहीं है. इस दौरान कपरपुरा व कांटी स्टेशन निकल जाते हैं. बीच में दो हॉल्ट हैं. इसके बाद मोतीपुर स्टेशन आयेगा. अब बात वासुदेव राय से शुरू होती है, जो कृषि विभाग में चालक थे. कहते हैं, अभी वोट के नाम पर जो हो रहा है, वो ठीक नहीं है.

कोई ये बात नहीं कर रहा है कि हम बिहार को आगे कैसे बढ़ायेंगे.

वासुदेव नेताओं के परिवारवाद पर कहते हैं, पहले खुद फिर बच्च. वो तो बढ़ते जा रहे हैं. उन्हें अपने बच्चों की चिंता है. गरीब के बच्च का क्या होगा? हमारे दादा जी गोबर उठाते थे. हम उनके पोता भी भैंस का गोबर उठा रहे हैं और हमारा बेटा भी वही करे, तो हमारी स्थिति बदली क्या?

वासुदेव पूसा से मोतिहारी जा रहे हैं. वासुदेव के सामने मदन प्रसाद बैठे हैं, जो समस्तीपुर से बेतिया जा रहे हैं. मदन चुनाव के बारे में बात नहीं करना चाहते. कहते हैं कि जब वोट आयेगा, तो उसकी बात करेंगे. मदन के बगलवाली सीट पर बीएमपी जवान कौशल कुमार हैं. सिविल ड्रेस में हैं. कौशल चुनाव को लेकर ज्यादा नहीं बोलते. बस इनता कहते हैं कि सबको वोट डालना चाहिये.

मुजफ्फरपुर-मोतिहारी रूट पर चकिया बड़ा स्टेशन है. चकिया से ट्रेन खुलते ही हम भी डिब्बा बदल लेते हैं. मुलाकात सोनी श्रीवास्तव व आकांक्षा से होती है, जो स्नातक के बाद पटना में रह कर बैंक पीओ की तैयारी कर रही हैं. दुर्गा पूजा की छुट्टी में घर रक्सौल जा रही हैं. दोनों के पिता परिवहन व्यवसाय से जुड़े हैं. इनकी बसें रक्सौल से काठमांडू के बीच चलती हैं.

मधेशी आंदोलन से बसों का चलना बंद है. इसकी वजह सोनी व आकांक्षा भारत सरकार को मानती हैं. सोनी व आकांक्षा भले साथ रह कर पढ़ती हैं, लेकिन दोनों की राजनीतिक पसंद अलग है. सोनी के अपने तर्क हैं, जिस पर कुछ हद तक सहमति जताने के बाद आकांक्षा खुल कर बोल पड़ती हैं. हम तो उक्त नेता के समर्थक हैं. जीवधारा स्टेशन आ जाता है. इसके बाद मोतिहारी कोर्ट और फिर बापूधाम मोतिहारी स्टेशन.

उतरने के दौरान गेट पर प्लास्टिक की बोतलों का गट्ठर लेकर खड़ी महूबन से मुलाकात होती है, जो पानी की खाली बोलत व प्लास्टिक की पन्नी चुन कर लायी है. मेहषी से मोतिहारी बाजार में बेचने जा रही है. कहती है, 70 से लेकर डेढ़ सौ रुपये तक मिल जाते हैं. कबाड़ की दुकान पर जायेंगे, सबको अलग-अलग करना पड़ेगा.

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