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buxar news : गांवों में पनप रही महाजनी प्रथा, माइक्रो फाइनेंस की आड़ में महिलाओं को कर्जदार बना रहे एजेंट

buxar news : कर्ज के मकड़जाल में फंसती जा रहीं ग्रामीण महिलाएंकर्ज न चुका पाने की स्थिति में किया जाता है अभद्र व्यवहार24 से 32 फीसदी तक वसूला जा रहा वार्षिक ब्याज35 हजार के ऋण के लिए जमा कराये जा रहे 48 हजार रुपये

buxar news : ब्रह्मपुर. मुजफ्फरपुर में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के कर्ज तले दबे तीन बेटियों व पिता की मौत के बाद पुलिस मुख्यालय द्वारा जांच का निर्देश जारी होते ही जिले में चल रही माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के बीच हड़कम की स्थिति हो गयी है.

जिले के ग्रामीण कस्बों में आरबीएल बैंक, भारत फाइनेंशियल इंक्लूजन लि, क्रेडिट एक्सेस ग्रामीण, कैसपोर माइक्रो क्रेडिट जैसी एक दर्जन से अधिक निजी माइक्रो फाइनेंस कंपनियों का संचालन जारी है. यहां की महिलाओं को लोन के मकड़जाल में इतना फांस चुके हैं कि उनका जीना मुहाल हो गया है. इन कंपनियों में से चार कंपनियों का साप्ताहिक, दो कंपनियों का पाक्षिक एवं शेष चार कंपनियों के ब्याज दर मासिक निर्धारित है. प्रत्येक दिन किसी न किसी कंपनी का लोन कलेक्शन एजेंट गांव पहुंचते हैं और महिलाओं से दबावपूर्वक किस्त की राशि वसूलते हैं. किसी कारण से यदि कोई महिला किस्त चुका पाने की स्थिति में नहीं होती, तो एजेंट उन महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार पर उतारू हो जाते हैं. जमींदारी प्रथा का अंत होते ही महाजनी प्रथा का आगाज हुआ, जिसकी जड़ें समाज में काफी मजबूती से फैली थी. जो 90 के दशक तक समाज में गरीबों का आर्थिक, मानसिक व शारीरिक शोषण करती रही.

समाज में महाजनी प्रथा की जड़ों को काटने के लिए सरकार की ओर से पहल करते हुए कई नयी योजनाओं की शुरुआत की गयी, जिसमें सरकार को सफलता भी मिली. इसमें खासकर सरकार की जीविका मिशन मील का पत्थर साबित हुई और सुदूर ग्रामीण इलाकों की महिलाएं घर की दहलीज लांघ कर बैंकिंग से वाकिफ हुईं. अब क्षेत्र की सैकड़ों महिलाएं जीविका की स्वयं सहायता समूह से जुड़ कर आत्मनिर्भर बनी हैं. लेकिन हाल के कुछ वर्षों से माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के मुखौटों की आड़ में फिर से समाज में महाजनी प्रथा पनप रही है. जिस पर स्थानीय प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है. समाज में अब नये कलेवर और नये लिबास में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों ने महाजनी प्रथा का आगाज किया है, जो ऋण के नाम पर भोले-भाले लोगों से 24 से 32 फीसदी तक वार्षिक ब्याज वसूल रही है.

एक बड़ी माइक्रो फाइनेंस कंपनी के अधिकारी ने बताया कि अमूमन अधिकांश माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के ऋण देने का तरीका अपना होता है, लेकिन ऋण वसूली का तरीका काफी गलत है. फिलवक्त माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के चंगुल में फंसे लाभुकों से 35 हजार के ऋण के लिए 48 हजार रुपये जमा कराये जा रहे हैं. इन कंपनियों के निशाने पर खासकर ग्रामीण इलाकों की महिलाएं रहती हैं. अधिकांश कंपनियां सिर्फ महिलाओं को ही ऋण की सुविधा देती है.

ऐसे फांस रहे महिलाओं को लोन के मकड़जाल में

उल्लेखनीय है कि माइक्रो फाइनेंस कंपनियां अपने फील्ड एजेंटों को पहले गांवों में भेजते हैं. फिर वो गांव की थोड़ी पढ़ी-लिखी और कुछ तेज-तर्रार महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं. उनके माध्यम से गांव की कुछ महिलाओं का एक ग्रुप तैयार किया जाता है. फिर उसी महिला समूह के माध्यम से धड़ल्ले से समूह की सभी महिलाओं को लोन दिया जाता है. साथ ही लोन की राशि को साप्ताहिक, पाक्षिक अथवा 12, 18, 24 से 30 माह के किस्तों में राशि वसूली का गोरखधंधा शुरू किया जाता है. इस बारे में बात करने पर गांव की शर्मीला देवी बताती हैं कि उन्होंने चापाकल बोरिंग के लिए लोन लिया था, फिर किराना की दुकान चलाने के लिए भी लोन लिया था. लेकिन कुछ ही दिनों बाद दुकान बंद करनी पड़ी, क्योंकि उसमें जो कोई भी बैठता था, वही बिक्री के पैसों को रख लिया करता था, आज दुकान सालभर से बंद है. लेकिन आज भी लोन का किस्त चुकाना ही पड़ता है.

क्या कहते हैं एलडीएम

एलडीएम सतीश कुमार ने कहा कि माइक्रो फाइनेंस के खिलाफ शिकायत आने के बाद जांच की जायेगी. अभी तक माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के खिलाफ कोई शिकायत नहीं मिली है.

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