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पुआ-पकवान का भोग लगाकर अहिरौली में गुजारी पंचकोसी की पहली रात

Updated at : 20 Nov 2024 10:15 PM (IST)
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पुआ-पकवान का भोग लगाकर अहिरौली में गुजारी पंचकोसी की पहली रात

पांच दिवसीय मेला के पहले दिन पंचकोसी का पड़ाव अहिल्या स्थान अहिरौली में रहा.

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बक्सर.

परंपरागत तरीके से बुधवार को सिद्धाश्रम (बक्सर) पंचकोसी परिक्रमा मेला का शुभारंभ हुआ. पांच दिवसीय मेला के पहले दिन पंचकोसी का पड़ाव अहिल्या स्थान अहिरौली में रहा. वहां गंगा स्नान के बाद श्रद्धालु देवी अहिल्या का दर्शन-पूजन किए और साधु-संतों के सान्निध्य में पुआ-पकवान का प्रसाद ग्राहण कर रात गुजारे. सबसे पहले पंचकोसी परिक्रमा समिति के तत्वावधान में नगर के रामरेखाघाट पर गंगा पूजन व आरती की गयी. इसके बाद महर्षि विश्वामित्र व प्रभु श्रीराम के जयघोष के साथ साधु-संतों का जत्था अहिरौली के लिए रवाना हुआ. वहां पहुंचने पर अहिरौली मठ के उत्तराधिकारी श्री अधुसूदनाचार्य जी की मौजूदगी में धर्माचार्यों को पुष्प माला व तिलक लगकर स्वागत किया गया. मठिया स्थित भगवान बरदराज का दर्शन कर साधु-संत मंदिर जाकर देवी अहिल्या का पूजन किए. पंचकोसी परिक्रमा मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्णपक्ष पंचमी तिथि से प्रारंभ होकर दशमी को संपन्न होती है. पांच दिनों की इस परिक्रमा में प्रत्येक स्थल पर अलग-अलग व्यंजन का भोग लगता है और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण कर श्रद्धालु रात्रि विश्राम करते हैं. अहिल्या धाम में पंचकोसी परिक्रमा समिति के अध्यक्ष श्री अच्युत प्रपन्नाचार्य, रामनाथ ओझा, अधिवकता सुबेदार पांडेय व सुदर्शनाचार्य उर्फ भोला बाबा आदि पहुंचे थे.

कथा के माध्यम से बतायी गयी अहिल्या धाम की महिमा :

अहिरौली मठिया परिसर में कथा-प्रवचन का आयोजन किया गया. जिसमें धर्माचार्यों ने पंचकोसी परिक्रमा के पौराणिक महत्व का उल्लेख करते हुए इसकी शास्त्रीय विधि बताई. श्री सुदर्शनाचार्य जी ने कहा कि त्रेता युग में बक्सर पहुंचे श्रीराम ने आशीर्वाद के लिए ऋषि आश्रमों की परिक्रमा की थी. उसी के उपलक्ष्य में पंचकोसी परिक्रमा का आयोजन होता है. पंचकोसी के दौरान जिन ऋषि द्वारा जिस व्यंजन का प्रसाद प्रभु श्रीराम व लक्ष्मण को खिलाया गया था. उसी व्यंजन को पकाकर खाने का विधान है.

प्रभु कृपा से पत्थर रूपी अहिल्या को मिला सप्तर्षि लोक :

पंचकोसी परिक्रमा के संबंध में आचार्य कृष्णानंद जी पौराणिक ने अहिल्या उद्धार का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी ब्राह्मण द्वारा अभिशप्त पत्थर की स्त्री को किसी राज कुमार के चरण की धूल से सजीव स्त्री बनकर अपने पति के साथ सप्तर्षि लोक में स्थान प्राप्त करने की यह पहली घटना है. इस संबंध में विद्वानों ने अलग-अलग कारण बताए हैं. उन्होंने कहा कि यद्यपि कि राम राज कुमार हैं, किन्तु वे साक्षात भगवान हैं. उनके चरण पापापहारी हैं. क्योंकि वे पतित पावन एवं उनके चरण गंगा के उद्गम स्थल भी हैं. कुछ विद्वानों का मत है कि ब्रह्मर्षि गौतम के ब्रह्म वाक्य आशीर्वाद के फलस्वरूप अहिल्या का उद्धार हुआ. वहीं कतिपय शास्त्रकारों द्वारा सिद्धाश्रम की पवित्र धूल के प्रभाव का परिणाम बताया गया है. कहीं महर्षि विश्वामित्र के तप के प्रभाव एवं उनके शिव संकल्प तो अहल्या का करोड़ों वर्षों के तप के कारण राम की कृपा का उल्लेख किया गया है.

नारद आश्रम नदांव में आज पहुंचेगा जत्था :

पंचकोशी परिक्रमा का जत्था गुरुवार को नदांव पहुंचेगा. वहां अद्धालु नारदेशर सरोवर में स्नान कर मंदिर में दर्शन-पूजन करेंगे. इसके बाद खिचड़ी का प्रसाद पकाकर भगवान को भोग लगाएंगे और प्रसाद ग्रहण करने के बाद भजन- कीर्तन करते हुए रात्रि विश्रम करेंगे. मान्यता के अनुसार नदांवव में देवर्षि नारद जी का आश्रम था. त्रेता युग में महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ को सफलता पूर्वक संपन्न कराने के उपरांत प्रभु श्रीराम अनुज लक्ष्मण के साथ नजदीक में आश्रम बनाकर जप-तप करने वाले पांच ऋषियों से उनका कुशल जानने व उनसे आशीर्वाद के लिए पहुंचे थे.

आंचल पर नाच कराने से होती है मनोकामना पूरी :

अहिल्या मंदिर परिसर में महिलाओं द्वारा अपने आंचल पर लौंडा नाच कराने की होड़ लगी थी. वे लौंडा को अपने आंचल पर नाच करा रही थीं. बदले में दक्षिणा लेकर हुड़ुका के थाप पर बच्चों को गोद में लेकर लौंडा नाच रहे थे. मान्यता के अनुसार बांझ अथवा संतान हीन महिलाएं पुत्र संतान होने पर देवी अहिल्या के दरबार में लौंडा नाच कराने की मन्नत मानती हैं और उनकी इच्छा पूर्ण होने पर लौंडा नचाकर मन्नतें पूरी करती हैं. कलावती देवी ने कहा कि विवाह के कई सालों तक उन्हें कोई संतान नहीं हुआ. इसके बाद वह माता अहिल्या के दरबार में पहुंचकर उनसे गुहार लगाईं. जिसके बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई. सो मन्नत पूरी करने हेतु लौंडा नाच करा रही है.

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