बक्सर में बदल गया मानसून का मिजाज, 2021 के बाद लगातार घट रही बारिश, खेती और भूजल पर गहराया संकट

सांकेतिक तस्वीर
बक्सर जिले में पिछले कुछ वर्षों से मानसून का मिजाज बदल रहा है, जिसके कारण 2021 के बाद से सामान्य से कम बारिश दर्ज की जा रही है। इसका सीधा असर खेती, जल संसाधनों और भूजल स्तर पर दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञ इस स्थिति को भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी मान रहे हैं।
Buxar Weather News :बक्सर जिले में पिछले कुछ वर्षों से मानसून का मिजाज लगातार बदलता नजर आ रहा है. वर्ष 2021 के बाद से सामान्य वर्षापात की तुलना में वास्तविक बारिश कम दर्ज की जा रही है. इसका असर खेती, जल संसाधनों और भूजल स्तर पर साफ दिखाई देने लगा है. कृषि विशेषज्ञों के साथ-साथ पर्यावरणविद भी इसे भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी मान रहे हैं.
Buxar News : 2021 के बाद लगातार घट रही बारिश
जिला सांख्यिकी विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में जिले के लिए सामान्य वर्षापात 932.10 मिमी निर्धारित था, जबकि 1132.57 मिमी बारिश दर्ज की गई थी. इसके बाद वर्षा का ग्राफ लगातार नीचे आता गया. वर्ष 2022 में 879.80 मिमी के मुकाबले 658.84 मिमी, वर्ष 2023 में 879.70 मिमी के मुकाबले 705.48 मिमी और वर्ष 2024 में 882.50 मिमी के मुकाबले 735.24 मिमी वर्षा हुई. वर्ष 2025 में सामान्य वर्षापात 880.10 मिमी निर्धारित था, लेकिन वास्तविक बारिश केवल 864.75 मिमी ही दर्ज की गई.
मानसून पर निर्भर खेती पर बढ़ा संकट
जिले की अधिकांश खेती आज भी मानसून आधारित है. समय पर और पर्याप्त बारिश नहीं होने से धान सहित खरीफ फसलों की बुआई और उत्पादन प्रभावित हो रहा है. किसानों को सिंचाई के लिए डीजल पंप और निजी बोरिंग पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है. इससे खेती की लागत बढ़ रही है और छोटे एवं सीमांत किसानों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ता जा रहा है.
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन बना वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्षा में कमी के पीछे जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ पर्यावरणीय असंतुलन भी बड़ा कारण है. जिले में लगातार पेड़ों की कटाई, हरित क्षेत्र में कमी और तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने स्थानीय मौसम चक्र को प्रभावित किया है. वृक्षों की संख्या घटने से वातावरण में नमी कम हो रही है, जिसका असर मानसून और वर्षा पर भी पड़ रहा है.
भूजल स्तर पर भी दिखने लगा असर
कम बारिश का प्रभाव केवल खेती तक सीमित नहीं है. जिले के कई इलाकों में भूजल स्तर गिरने की शिकायतें सामने आने लगी हैं. हैंडपंप और कुओं का जलस्तर नीचे जाने से लोगों की चिंता बढ़ गई है. यदि आने वाले वर्षों में भी बारिश का यही हाल रहा तो पेयजल संकट और गहरा सकता है.
विशेषज्ञों ने समय रहते उठाए ठोस कदमों की जरूरत बताई.
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षा के बदलते स्वरूप को देखते हुए जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, बड़े पैमाने पर पौधरोपण और भूजल पुनर्भरण जैसी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा. साथ ही किसानों को जलवायु अनुकूल खेती और आधुनिक सिंचाई तकनीकों को अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित करना जरूरी है.
वर्षवार सामान्य और वास्तविक वर्षापात (मिलीमीटर में)
| वर्ष | सामान्य वर्षापात | वास्तविक वर्षापात |
| 2021 | 932.10 | 1132.57 |
| 2022 | 879.80 | 658.84 |
| 2023 | 879.70 | 705.48 |
| 2024 | 882.50 | 735.24 |
| 2025 | 880.10 | 864.75 |
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