बक्सर में विकास की मार झेल रही प्रकृति, पेड़ों की कटाई से बिगड़ा संतुलन; लोगों ने जताई चिंता

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Buxar News: बक्सर में चौसा-मोहनिया स्टेट हाईवे के चौड़ीकरण कार्य के दौरान सैकड़ों पुराने पेड़ों की कटाई से पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर असर पड़ा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि पेड़ों के खत्म होने से गर्मी बढ़ी है और राहगीरों के लिए छांव भी दुर्लभ हो गई है.

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Buxar News:(पंकज कमल) बक्सर के राजपुर विकास परियोजनाओं के लिए सड़कों का चौड़ीकरण आवश्यक माना जाता है, लेकिन जब इसकी कीमत पर्यावरण को चुकानी पड़े तो सवाल उठना स्वाभाविक है. राजपुर थाना क्षेत्र में इन दिनों कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिल रहा है. चौसा-मोहनिया स्टेट हाईवे के चौड़ीकरण के लिए रामपुर से बनारपुर गांव तक लगभग 12 किलोमीटर के दायरे में सड़क किनारे लगे सैकड़ों हरे-भरे पेड़ों को काट दिया गया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से खड़े ये पेड़ क्षेत्र की पहचान और पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे.

सदियों पुराने पेड़ों का हुआ सफाया

रामपुर, बनारपुर, निकृष, डिहरी, ईसापुर और चौबे की छावनी सहित कई गांवों के आसपास सड़क किनारे पीपल, बरगद और अन्य छायादार वृक्ष मौजूद थे. इनमें से कई पेड़ दशकों नहीं, बल्कि सैकड़ों वर्षों पुराने बताए जाते हैं. ये पेड़ केवल हरियाली का प्रतीक नहीं थे, बल्कि राहगीरों को तपती धूप से राहत देने के साथ-साथ ग्रामीण जीवन और सामाजिक गतिविधियों के भी केंद्र थे.

ग्रामीणों के अनुसार, इन पेड़ों की छांव में लोग विश्राम करते थे, आपसी संवाद करते थे और सामाजिक मेल-मिलाप का वातावरण बना रहता था. अब इन पेड़ों के कट जाने से न केवल प्राकृतिक सौंदर्य प्रभावित हुआ है, बल्कि लोगों की भावनाएं भी आहत हुई हैं.

अभी और पेड़ों पर मंडरा रहा खतरा

स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क किनारे खड़े कई अन्य छोटे-बड़े पेड़ों पर भी लाल निशान लगाए गए हैं. इससे आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में और पेड़ों की कटाई हो सकती है। यदि ऐसा हुआ तो क्षेत्र में हरियाली और अधिक कम हो जाएगी तथा पर्यावरणीय चुनौतियां बढ़ सकती हैं.

पर्यावरण संरक्षण के दावों पर उठे सवाल

एक ओर सरकार और विभिन्न विभाग पर्यावरण संरक्षण तथा वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के लिए अभियान चलाते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई स्थानीय लोगों के बीच चिंता का विषय बनी हुई है. ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग और पंचायत स्तर पर हर वर्ष पौधारोपण की योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका प्रभाव बहुत कम दिखाई देता है.

लोगों का आरोप है कि कागजों पर वृक्षारोपण के आंकड़े तो मौजूद हैं, लेकिन सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर पर्याप्त संख्या में विकसित पेड़ नजर नहीं आते. ऐसे में पुराने पेड़ों की कटाई के बाद उनकी भरपाई होती नहीं दिख रही है.

बढ़ती गर्मी और बिगड़ता स्थानीय जलवायु संतुलन

गंगा, कर्मनाशा और अन्य नदियों के मैदानी क्षेत्र में स्थित राजपुर का मौसम पहले अपेक्षाकृत संतुलित माना जाता था. हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि हाल के वर्षों में तापमान में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े और घने पेड़ स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने, वायु की गुणवत्ता सुधारने और नमी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

ग्रामीणों का मानना है कि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के कारण क्षेत्र में गर्मी का प्रभाव अधिक महसूस किया जा रहा है. पहले जहां पुरवा हवा के साथ कुछ राहत मिल जाती थी, वहीं अब खुले और वृक्षविहीन इलाकों में तेज धूप और गर्म हवाओं का असर बढ़ गया है.

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत

सड़क चौड़ीकरण जैसी परियोजनाएं क्षेत्रीय विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण को नजरअंदाज कर किया गया विकास भविष्य में गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकता है. स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि पेड़ों की कटाई के साथ-साथ बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और उनके संरक्षण की प्रभावी व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे.

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रागिनी शर्मा

लेखक के बारे में

By रागिनी शर्मा

वर्तमान में मैं, रागिनी शर्मा पटना स्थित प्रभात खबर डिजिटल की टीम के साथ कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हूं. यहां मैं बिहार के विभिन्न जिलों से जुड़ी अहम खबरों, राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों और ट्रेंडिंग विषयों पर काम कर रही हूं. मेरा उद्देश्य हर खबर को सरल, सटीक और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक न सिर्फ जानकारी प्राप्त करें बल्कि उससे जुड़ाव भी महसूस करें और डिजिटल पत्रकारिता को और अधिक सार्थक बनाया जा सके.

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