नालंदा : राजगीर के ऐतिहासिक गर्मजल कुंडों पर संकट, कभी कल-कल बहने वाले झरने अब हो रहे मौन

मार्कण्डेय कुंड | Prabhat Khabar Network
राजगीर के हजारों साल पुराने गर्मजल कुंड और झरने आज गंभीर संकट में हैं. भूजल के अनियंत्रित दोहन और पहाड़ियों की कटाई के कारण ये अनमोल प्राकृतिक धरोहरें धीरे-धीरे सूखती जा रही हैं. इससे स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों में गहरी चिंता है.
विश्वविख्यात पर्यटन और आध्यात्मिक नगरी राजगीर के प्राचीन गर्मजल कुंडों और प्राकृतिक झरनों का अस्तित्व गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है. हजारों वर्षों से श्रद्धा, आस्था, प्राकृतिक चिकित्सा और भूगर्भीय विरासत के प्रतीक रहे ये कुंड धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं.
इससे स्थानीय निवासियों, पर्यावरणविदों और इतिहासकारों में गहरी चिंता व्याप्त है. विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि समय रहते इनका वैज्ञानिक संरक्षण नहीं किया गया, तो राजगीर की यह अनमोल प्राकृतिक धरोहर केवल इतिहास के पन्नों और तस्वीरों तक सीमित होकर रह जाएगी.
ब्रह्मकुंड क्षेत्र के चार कुंड पूरी तरह सूखे, सप्तधारा से टपक रहा पानी
राजगीर के गर्मजल स्रोत मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में विभाजित हैं-ब्रह्मकुंड क्षेत्र और सूर्यकुंड क्षेत्र.
- ब्रह्मकुंड क्षेत्र: इस क्षेत्र में ब्रह्मकुंड, सप्तधारा कुंड, गंगा-यमुना कुंड, अनंतऋषि कुंड, व्यास कुंड, मारकंडेय कुंड तथा काशीधारा कुंड स्थित हैं. इनमें से गंगा-यमुना कुंड, अनंतऋषि कुंड, व्यास कुंड और मारकंडेय कुंड पूरी तरह सूख चुके हैं.
- कभी निरंतर वेग से प्रवाहित होने वाला सप्तधारा कुंड भी अब अपनी पहचान खोता जा रहा है. इसकी सातों धाराओं से अब बेहद कम मात्रा में पानी निकल रहा है, मानो किसी संकीर्ण पाइप से जल टपक रहा हो. वर्तमान में केवल ब्रह्मकुंड और काशीधारा कुंड ही इस क्षेत्र की गरिमा को किसी तरह संभाले हुए हैं.
- सूर्यकुंड क्षेत्र: दूसरी ओर सूर्यकुंड क्षेत्र के सूर्य कुंड, चंद्रमा कुंड, गणेश कुंड, राम-लक्ष्मण कुंड, अहिल्या कुंड, सीता कुंड और गौरी कुंड के अधिकांश झरनों से फिलहाल जल प्रवाहित हो रहा है. हालांकि, भूजल पुनर्भरण न होने पर भविष्य में इन पर भी संकट गहरा सकता है.
अनियंत्रित भूजल दोहन और पहाड़ियों की कटाई बनी मुख्य वजह
भूगर्भीय दृष्टि से राजगीर के गर्मजल कुंड अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. माना जाता है कि धरती की गहराइयों में मौजूद भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy), चट्टानों की विशिष्ट संरचना और प्राकृतिक दरारों से होकर गर्म जल सतह पर आता है.
लेकिन अनियंत्रित भूजल दोहन, पहाड़ियों की कटाई, अतिक्रमण, जलग्रहण क्षेत्रों (Catchment Areas) के क्षरण तथा बदलते जलवायु चक्र ने इन प्राकृतिक स्रोतों के पारिस्थितिकी संतुलन को बुरी तरह प्रभावित किया है. यही कारण है कि सदियों से प्रवाहित रहने वाले अनेक झरने अब दम तोड़ रहे हैं.
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के लिए बड़ी चुनौती
धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राजगीर के इन गर्मजल कुंडों का गहरा संबंध भगवान बुद्ध, भगवान महावीर तथा अनेक ऋषियों-मुनियों की तपोस्थली और मगध साम्राज्य के राजाओं से रहा है. देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इन कुंडों में स्नान को पुण्यदायी और स्वास्थ्यवर्धक (औषधीय गुणों से युक्त) मानते हैं. ऐसे में इनका सूखना केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था के लिए भी बड़ा झटका है.
प्रबुद्ध नागरिकों और समाजसेवियों ने की व्यापक जांच की मांग
राजगीर के प्रबुद्ध नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने बिहार सरकार व प्रशासन से मांग की है कि:
- गर्मजल कुंडों के जलस्रोतों का व्यापक भूवैज्ञानिक अध्ययन (Geological Study) कराया जाए.
- प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्रों (कैचमेंट एरिया) को सुरक्षित व अतिक्रमण मुक्त किया जाए.
- आसपास हो रहे अवैध भूजल दोहन पर तत्काल प्रभाव से सख्ती से रोक लगाई जाए.
स्थानिय लोगों का कहना है कि यदि अभी ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए राजगीर के ये ऐतिहासिक गर्मजल कुंड केवल कहानियों में ही सिमट कर रह जाएंगे.
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