नालंदा की विरासत विश्व की अमूल्य धरोहर : राज्यपाल

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नालंदा की विरासत विश्व की अमूल्य धरोहर : राज्यपाल

फोटो - नालंदा के ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल का निरीक्षण करते राज्यपाल, कुलपति, एसीएस, डीएम एवं अन्य | Prabhat Khabar Network

राज्यपाल ने नालंदा की गौरवशाली अकादमिक विरासत और ह्वेनसांग स्मारक के संरक्षण प्रयासों की सराहना की। जानिए नालंदा के ऐतिहासिक महत्व के बारे में विस्तार से।

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राज्यपाल ने नालंदा की अकादमिक विरासत को बताया विश्व के लिए प्रेरणा का केंद्र नालंदा की ज्ञान परंपरा से रूबरू हुए राज्यपाल, ह्वेनसांग स्मारक के संरक्षण प्रयासों की सराहना फोटो - नालंदा के ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल का निरीक्षण करते राज्यपाल, कुलपति, एसीएस, डीएम व अन्य. प्रतिनिधि, राजगीर. राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) ने बुधवार को नालंदा के ह्वेनसांग स्मारक परिसर का भ्रमण किया. इस दौरान नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने उनका स्वागत करते हुए प्राचीन नालंदा की प्रतिकृति मुहर भेंट की. राज्यपाल ने स्मारक परिसर में प्रदर्शित ऐतिहासिक धरोहरों, दुर्लभ चित्रों, ह्वेनसांग की अस्थि संग्रहालय और प्रदर्शनों का अवलोकन किया. बौद्ध अध्ययन, भारतीय ज्ञान परंपरा और नालंदा की गौरवशाली अकादमिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए महाविहार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की उन्होंने सराहना की. उन्होंने संस्थान की भावी योजनाओं में हरसंभव सहयोग का आश्वासन भी दिया. भ्रमण के बाद राज्यपाल ने आगंतुक पुस्तिका में अपने विचार भी दर्ज किये. इस अवसर पर कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने राज्यपाल को आचार्य ह्वेनसांग के जीवन, भारत यात्रा, प्राचीन नालंदा महाविहार में उनके अध्ययन तथा बौद्ध दर्शन के संरक्षण एवं प्रसार में उनके ऐतिहासिक योगदान की विस्तृत जानकारी दी. उन्होंने ह्वेनसांग स्मारक परिसर की स्थापना, उसके निर्माण के इतिहास और भारत-चीन सांस्कृतिक मैत्री के प्रतीक के रूप में उसकी भूमिका पर भी प्रकाश डाला. कुलपति ने बताया कि प्राचीन नालंदा महाविहार केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि संपूर्ण एशिया और विश्व के लिए ज्ञान, अनुसंधान, बौद्ध दर्शन तथा सांस्कृतिक संवाद का प्रमुख केंद्र था. चीन, कोरिया, जापान, श्रीलंका, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया सहित अनेक देशों के विद्यार्थी यहां शिक्षा और शोध के लिए आते थे. आचार्य ह्वेनसांग इसी गौरवशाली परंपरा के प्रमुख संवाहक थे, जिनके यात्रा-वृत्तांत आज भी प्राचीन भारत और नालंदा के इतिहास के सबसे प्रामाणिक स्रोत माने जाते हैं. उन्होंने बताया कि नव नालंदा महाविहार प्राचीन नालंदा की ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से कार्य कर रहा है. यहां बौद्ध अध्ययन, पालि, संस्कृत, दर्शन, प्राचीन इतिहास, बौद्ध पर्यटन, भारतीय ज्ञान परंपरा, अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग तथा पांडुलिपि अध्ययन एवं संरक्षण जैसे विषयों पर शिक्षा, शोध और प्रशिक्षण संचालित किया जा रहा है. महाविहार का उद्देश्य विरासत के संरक्षण के साथ उसे समकालीन समाज और वैश्विक अकादमिक जगत से जोड़ना है. कुलपति ने राज्यपाल को यह भी जानकारी दी कि भारत सरकार के ''ज्ञान भारतम् मिशन'' के तहत नव नालंदा महाविहार को बिहार क्लस्टर सेंटर की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसके अंतर्गत प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण, सूचीकरण और भारतीय ज्ञान परंपरा के दस्तावेजीकरण का व्यापक कार्य चल रहा है. उन्होंने बताया कि भविष्य में पटना संग्रहालय में सुरक्षित आचार्य ह्वेनसांग के पवित्र अवशेष को स्मारक परिसर में स्थापित करने की योजना है. इससे यह स्थल अंतरराष्ट्रीय बौद्ध श्रद्धालुओं, शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए और अधिक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र बन सकेगा. इस अवसर पर राज्यपाल के प्रधान सचिव दीपक कुमार सिंह, जिला पदाधिकारी उदिता सिंह, पुलिस अधीक्षक भारत सोनी सहित प्रशासनिक अधिकारी, नव नालंदा महाविहार के शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मी उपस्थित रहे.

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