बिहारशरीफ में मेयार जलाशय का आधा-अधूरा जीर्णोद्धार, सिंचाई व्यवस्था पर मंडराया संकट, किसानों ने की उच्चस्तरीय जांच की मांग

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जीर्णोद्धार के बाद राजगीर के मेयार जलाशय की तस्वीर

राजगीर के मेयार जलाशय के अधूरे जीर्णोद्धार से सिंचाई संकट गहरा गया है। किसानों ने सरकारी राशि के दुरुपयोग की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

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राजगीर प्रखंड के मेयार गांव का 14.87 एकड़ में फैला जलाशय किसानों के लिए सिंचाई का बड़ा सहारा है. लेकिन इसके आधे- अधूरे जीर्णोद्धार ने खेती के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिये हैं. करीब दो करोड़ रुपये की लागत से लघु जल संसाधन विभाग की ‘हर खेत तक सिंचाई का पानी’ योजना के तहत कराये जा रहे उड़ाही एवं जीर्णोद्धार कार्य को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाया है कि जलाशय की वास्तविक क्षमता के अनुरूप काम नहीं किया गया है. ग्रामीणों की चिंता सिर्फ सरकारी राशि के खर्च तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले खरीफ और रबी मौसम में सिंचाई सुविधा पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर भी है.

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ग्रामीणों के अनुसार जलाशय के 14.87 एकड़ क्षेत्रफल में से करीब सात एकड़ हिस्से में ही खुदाई और उड़ाही करायी गयी है. शेष हिस्से में काम नहीं होने का आरोप है. ग्रामीणों का कहना है कि इतने बड़े जलाशय का आधा हिस्सा यदि गाद और मिट्टी से भरा रह गया, तो बारिश के पानी का अपेक्षित संचयन संभव नहीं होगा. इससे जलाशय की उपयोगी जलधारण क्षमता प्रभावित होगी और किसानों को जरूरत के समय पर्याप्त पानी नहीं मिल सकेगा. सावन के इस महीने में भी यह जलाशय सूखा है.

फोटो - जीर्णोद्धार के बाद राजगीर के मेयार जलाशय की तस्वीर | Prabhat Khabar Network
जीर्णोद्धार के बाद राजगीर के मेयार जलाशय की तस्वीर

सात फीट की जगह तीन फीट खुदाई का आरोप

ग्रामीणों ने स्वीकृत प्राक्कलन के अनुसार खुदाई की गहराई पर भी सवाल उठाया है. उनका दावा है कि लघु सिंचाई विभाग द्वारा करीब सात फीट तक मिट्टी की खुदाई-उड़ाही का प्रावधान है, जबकि स्थल पर लगभग तीन फीट तक ही खुदाई हुई है. यदि यह स्थिति जांच में सही पायी जाती है, तो जलाशय की भंडारण क्षमता और जीर्णोद्धार की गुणवत्ता का तकनीकी परीक्षण महत्वपूर्ण हो जाएगा. ग्रामीणों ने मापी पुस्तिका, प्राक्कलन और स्थल पर हुए वास्तविक कार्य का मिलान कराने की मांग डीएम उदिता सिंह से की है. जीर्णोद्धार कार्य 14 मार्च 2026 से शुरू होने और मार्च 2027 तक चलने की समयसीमा से जुड़ा बताया गया है. ग्रामीणों का कहना है कि कार्य अवधि के दौरान ही स्थल का स्वतंत्र तकनीकी निरीक्षण कर वास्तविक प्रगति दर्ज की जानी चाहिए, ताकि बाद में कार्य की मात्रा को लेकर विवाद की स्थिति न बने. मेयार निवासी प्रवीण कुमार सिंह सहित अन्य ग्रामीणों ने लघु जल संसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव और नालंदा जिलाधिकारी को आवेदन देकर उच्चस्तरीय कमेटी गठित करने की मांग की है. ग्रामीण चाहते हैं कि उच्च स्तरीय टीम जलाशय की पैमाइश कर खुदाई की मात्रा, गहराई और कार्य की गुणवत्ता का तकनीकी आकलन करे. साथ ही जलाशय से निकाली गयी मिट्टी के उठाव, परिवहन और कथित बिक्री की भी जांच की जाये.

जल संचयन बढ़ेगा तो खेती को मिलेगा सहारा

कृषि विशेषज्ञों की दृष्टि से किसी भी सिंचाई जलाशय की उपयोगिता उसकी जलधारण क्षमता और कैचमेंट से आने वाले पानी के प्रभावी संचयन पर निर्भर करती है. ग्रामीणों का कहना है कि मेयार जलाशय की पूरी और वैज्ञानिक उड़ाही होने पर बरसाती पानी को लंबे समय तक संरक्षित किया जा सकता है. इससे खरीफ में बारिश के बीच का अंतराल और रबी में सिंचाई की जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है. जलाशय में पर्याप्त पानी रहने से आसपास के कुओं, चापाकलों, नलकूपों और भू-जल स्रोतों को भी रिचार्ज मिलने की संभावना है. ग्रामीणों ने प्रशासन से स्थल निरीक्षण कर वास्तविक कार्य और स्वीकृत प्राक्कलन का मिलान कराने, दोषी पाए जाने पर कार्रवाई करने तथा जलाशय का जीर्णोद्धार निर्धारित मानकों के अनुरूप कराने की मांग की है. प्रशासन केवल कागजी रिपोर्ट के आधार पर नहीं, बल्कि स्थल पर पहुंचकर जलाशय की पैमाइश और जलधारण क्षमता का आकलन कराये. उनका कहना है कि मेयार जलाशय को महज निर्माण कार्य नहीं, बल्कि किसानों की सिंचाई सुरक्षा के स्थायी संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए। जांच में अनियमितता प्रमाणित होने पर जिम्मेदारी तय करने और शेष कार्य को तकनीकी मानकों के अनुरूप पूरा कराने की मांग भी ग्रामीणों ने की है.

अधिकारी बोले

लघु सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता सुनील कुमार ने कहा कि नियमानुकूल मेयार जलाशय की खुदाई- उड़ाही करायी गयी है. जलाशय की जमीन पर ग्रामीणों द्वारा बड़े पैमाने पर अतिक्रमण किया गया है. जलाशय में बिजली के 13 पोल गाड़े हुये हैं. अतिक्रमण हटाने के लिए अंचलाधिकारी, राजगीर को पत्र लिखा गया है। ग्रामीणों का कोई आरोप है तो जांच के बाद ही उसका सत्यापन हो सकेगा.


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