Bihar: विक्रमशिला महाविहार के बहुरेंगे दिन, जंगली स्थान के पास टीले के ट्रायल ट्रेंच की चल रही तैयारी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 11 Mar 2023 1:54 PM
Bihar: विक्रमशिला महाविहार की भव्यता से दुनिया जल्द ही परिचित होगी. बताया कि दुनिया भर में मशहूर कहलगांव के अंतीचक स्थित विक्रमशिला महाविहार को और आकर्षक बनाने की तैयारी चल रही है. ऐतिहासिक महत्व से भरे-पूरे इस स्थान की और खुदाई की ज्यादा गुंजाइश तो नहीं है.
Bihar: विक्रमशिला महाविहार की भव्यता से दुनिया जल्द ही परिचित होगी. बताया कि दुनिया भर में मशहूर कहलगांव के अंतीचक स्थित विक्रमशिला महाविहार को और आकर्षक बनाने की तैयारी चल रही है. ऐतिहासिक महत्व से भरे-पूरे इस स्थान की और खुदाई की ज्यादा गुंजाइश तो नहीं है, लेकिन इसके समीप स्थित जंगली स्थान के पास टीले का ट्रायल ट्रेंच होने की तैयारी है. इसी वर्ष अप्रैल में ट्रायल ट्रेंच किये जाने की संभावना है. विशेषज्ञों ने उम्मीद जतायी है कि यह टीला पाल काल का एकल संस्कृति स्थल साबित हो सकता है. विक्रमशिला महाविहार परिसर में पूर्व और उत्तर पूर्व की ओर मोनास्टिक (मठवासी कक्ष) का संरक्षण प्रगति पर है. इसके अलावा पश्चिम की ओर मठवासी कक्षों और दक्षिण की ओर मठवासी सीढ़ियों का संरक्षण भी प्रस्तावित है और निविदा प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. परिसर के अंदर तिब्बती मंदिर का संरक्षण और उत्तर की ओर मंडप द्वार का संरक्षण भी प्रस्तावित है. विक्रमशिला संग्रहालय और मठ परिसर में चहारदीवारी का निर्माण किया गया है.
गोड्डा के सांसद डॉ निशिकांत दुबे ने बताया कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की टीम ने राजा कर्ण से जुड़े इतिहास को संरक्षित करने के लिए करौं स्थित कर्णेश्वर मंदिर तथा आसपास के इलाकों का जायजा लिया है. अप्रैल से खुदाई का काम शुरू हो जायेगा. आने वाले समय में पर्यटन के लिहाज से यह क्षेत्र काफी विकसित होगा व रोजगार के भी एक बड़े केंद्र के रूप में उभरेगा. भारत सरकार इस दिशा में काफी गंभीर है.
ट्रायल ट्रेंचिंग पुरातात्विक मूल्यांकन की एक तीव्र और अपेक्षाकृत सस्ती विधि है. इसका उपयोग किसी स्थल की पुरातात्विक क्षमता का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है. एक राष्ट्रीय परियोजना के तहत लगभग एक दशक तक साइट की खुदाई की गयी थी. एक बड़े क्षेत्र की खुदाई की गयी और प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय के कई संरचनात्मक अवशेषों को उजागर और संरक्षित किया गया. वर्ष 2023-2024 के दौरान इस क्षेत्र में उत्खनित सभी स्थलों के संरक्षण का कार्य होने का प्रस्ताव है.
विक्रमशिला सबसे बड़े बौद्ध विश्वविद्यालयों में से एक था, जिसकी स्थापना आठवीं शताब्दी के अंत में दूसरे पाल सम्राट धर्मपाल ने की थी. पटना विश्वविद्यालय और बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 15 से अधिक वर्षों तक व्यापक उत्खनन किये गये. इसमें सैकड़ों मठवासी कक्षों, प्रवेश द्वारों, चहारदीवारी आदि के साथ एक बड़े चैत्य को उजागर किया गया. इसमें हिंदू देवताओं की मूर्तियां भी मिली हैं. स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत संरक्षित है. संरक्षित क्षेत्र लगभग 104.62 एकड़ में है.
वर्ष 2004 में स्थापित विक्रमशिला संग्रहालय में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (1972-82) द्वारा किये गये उत्खनन के दौरान खोजे गए कुछ चुनिंदा पुरावशेषों को प्रदर्शित किया गया है. उत्खनन से एक विशाल वर्गाकार बौद्ध मठ का पता चला था, जिसके केंद्र में एक सलीब के आकार का स्तूप है और इसके दक्षिण-पश्चिम कोने में एक पुस्तकालय जुड़ा हुआ है. इस साइट की मूर्तियों की विशेषताएं कला के एक अलग स्कूल की गवाही देती हैं.
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