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Bihar News: नहीं रहे गांधीवादी द्वारिको सुंदरानी; जीवन भर बिना मसाले का भोजन, रात में कभी खाना नहीं खाया

By Prabhat Khabar Print Desk
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समाजसेवा में अपने जीवन को ताउम्र समर्पित कर चुके द्वारिको सुंदरानी का निधन
समाजसेवा में अपने जीवन को ताउम्र समर्पित कर चुके द्वारिको सुंदरानी का निधन
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Bihar News: वयोवृद्ध गांधीवादी विचारधारा के साथ समाजसेवा में अपने जीवन को ताउम्र समर्पित कर चुके द्वारिको सुंदरानी उर्फ भाईजी ने बुधवार की अहले सुबह करीब चार बजे समन्वय आश्रम में अंतिम सांस ली. उनका दाह-संस्कार राजकीय सम्मान के साथ बोधगया में आज होगा. समन्वय आश्रम के ट्रस्टी रहे भाईजी के निधन से बोधगया में शोक की लहर फैल गयी और सभी ने उन्हें नमन करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित बिहार के कई नेताओं ने भी द्वारिको सुंदरानी के निधन पर गहरी शोक संवेदना व्यक्त की है. सीएम ने कहा है कि स्व सुंदरानी ने अपना पूरा जीवन समाजसेवा में समर्पित कर दिया था. उनके निधन से सामाजिक क्षेत्र में अपूरणीय क्षति हुई है. महात्मा गांधी व विनोबा भावे के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात करते हुए 99 बसंत देख चुके द्वारिको सुंदरानी उर्फ भाईजी का जीवन तो आधुनिकता से दूर रहा ही, उनका भोजन भी सादगी भरा रहा. उन्होंने जीवन भर बगैर मसाले का भोजन किया. सिर्फ नमक डाल कर उबली हुईं सब्जियों और शुद्ध शाकाहारी भोजन कर अपना जीवन समाज सेवा के साथ समर्पित कर दिया.

उक्त जानकारी पिछले 42 वर्षों से समन्वय आश्रम में रह कर उनकी सेवा में जुटीं विमला बहन ने दी. उन्होंने बताया कि वह मात्र 17-18 वर्ष की आयु में समन्वय आश्रम पहुंची थीं और तब से वह भाईजी के साथ ही आश्रम में रह रही हैं. भाईजी ने उन्हें छोटी बहन का दर्जा दिया हुआ था. उन्होंने बताया कि वह सुबह तीन बजे बिस्तर छोड़ देते थे. नित्य क्रिया से निवृत्त होकर चार बजे आश्रम के बच्चों के साथ सर्वधर्म प्रार्थना करते थे. इसके बाद पांच बजे से बच्चों की पढ़ाई शुरू होती थी, जिसमें भाईजी भी बैठा करते थे.

इसके बाद सुबह आठ बजे दूध व दलिया का नाश्ता करते थे. फल भी लिया करते थे. इसके बाद आगंतुकों से मुलाकात-बात व कहीं बाहर जाने का कार्यक्रम होता था. दोपहर करीब एक बजे रोटी व सब्जी का भोजन करते थे. उनके लिए बनी सब्जी में नमक के अलावा किसी तरह का मसाला नहीं डाला जाता था. सिर्फ उबली हुई सब्जियां खाते थे. उन्होंने कभी भी अंडे या मांस-मछली का आहार नहीं किया.

फुर्सत के क्षणों में वह अखबार के साथ गांधीजी, विनोबा व बुद्ध से जुड़ी किताबों का अध्ययन किया करते थे. शाम सात बजे बगैर खाना खाये सिर्फ दूध पीकर सो जाया करते थे. उन्हें कभी भी रात को खाना खाते नहीं देखा गया. पहनावे के रूप में भाईजी ने सिर्फ खादी के कपड़ों का ही उपयोग किया और स्नान करने के लिए खादी ग्रामोद्योग में निर्मित साबुन का इस्तेमाल किया करते थे.

गांधी, विनोबा व जेपी के सान्निध्य में गुजारी जवानी

छह जून 1922 को पाकिस्तान (तब अविभाजित भारत)के सिंध प्रांत अंतर्गत लरकाना के मानजन गांव में जन्मे द्वारिको सुंदरानी देश के विभाजन के बाद भारत चले आये थे. यहां उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई और कुछ वक्त उनके सान्निध्य में रहने के बाद भूदान आंदोलन के वक्त आचार्य विनोबा भावे के साथ महाराष्ट्र के वर्धा आश्रम में दो साल तक समय व्यतीत किया. इसके बाद विनोबा भावे के निर्देश पर बोधगया में समन्वय आश्रम की स्थापना की गयी और भाईजी को इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गयी.

बिहार में पड़े भयंकर अकाल के वक्त उन्होंने बोधगया में खिचड़ी का वितरण करा कर जयप्रकाश नारायण का ध्यान अपनी ओर खींचा था. तब जेपी ने भी बोधगया आकर भाईजी से मुलाकात की थी. बाद में इनका उनसे मिलना-जुलना होता रहा. इस दौरान 16 नवंबर 1984 से 18 जुलाई 1995 तक वह बोधगया मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के सचिव भी रहे.

मुख्य रूप से मुसहर जाति के उत्थान व उन्हें शिक्षित करने के प्रति इनके समर्पण को देखते हुए 1992 में भाईजी को जमना लाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बोधगया में 1984 से अब तक मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए आयोजित होने वाले शिविर का श्रेय भी भाईजी को ही जाता है. गुजरात के हीरा व्यवसायी भंसाली ट्रस्ट के माध्यम से यहां नेत्र शिविर का आयोजन भाईजी की प्रेरणा से कर रहे हैं.

Posted By: Utpal Kant

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