सती बिहुला की जन्मस्थली आज भी सरकारी उपेक्षा का शिकार! हर साल 17 अगस्त को मायके उजानी आती हैं माता, जानें सोने की नाव और घड़े का रहस्य

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फोटो- उजैनी में सती बिहुला की जन्मस्थली को लेकर संपर्क करते ग्रामीण | Prabhat Khabar Network

गोपालपुर की उजानी गांव, सती बिहुला की पावन जन्मस्थली होने के बावजूद सरकारी उपेक्षा का शिकार है। सोने की नाव और घड़े से जुड़ी अनोखी जनश्रुति वाले इस ऐतिहासिक स्थल पर ग्रामीणों ने अतिक्रमण के खिलाफ आवाज उठाई है।

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गोपालपुर (भागलपुर), अंग जनपद की समृद्ध सांस्कृतिक और लोक आस्था में, सती बिहुला का स्थान बेहद महत्वपूर्ण और सर्वोपरि माना जाता है. गंगा और कोसी नदी की गोद में बसे नवगछिया अनुमंडल के गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत उजैनी (उजानी) गांव को, सती बिहुला का मायका व जन्मस्थली माना जाता है. लोक मान्यताओं और परंपरा के अनुसार, प्रत्येक वर्ष 17 अगस्त को सती बिहुला अपने मायके उजानी आती हैं, जिसकी गवाह यहाँ की सदियों पुरानी परंपराएं आज भी दे रही हैं. आइए इस ऐतिहासिक स्थल की महिमा और इसके दर्द को विस्तार से समझते हैं.

सोने की नाव और घड़े की अनोखी जनश्रुति, उजानी के प्राचीन पोखर में दबा है रहस्य

सदियों से चली आ रही जनश्रुति के अनुसार, सती बिहुला सोने की नाव पर सवार होकर ऐतिहासिक खिरनय नदी को पार किया करती थीं. उस दौरान, उनकी पांचों बहनें सोने के घड़ों में पानी भरकर लाया करती थीं. उजैनी गांव के स्थानीय लोगों का आज भी यह अटूट विश्वास है कि, माता के वे पौराणिक सोने के घड़े आज भी उजैनी के अत्यंत प्राचीन पोखर में नीचे दबे हुए हैं, जो इस पावन लोकगाथा की अमिट स्मृति के रूप में वहां मौजूद हैं. पूरे अंग क्षेत्र में प्रतिवर्ष सती बिहुला-विषहरी पूजा बेहद हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है, और जगह-जगह उनके भव्य मंदिर स्थापित हैं.

विडंबना: जिस जन्मस्थली पर होना था भव्य स्मारक, वहां बिखरा है अतिक्रमण का जाल

यह बेहद दुखद और हैरान करने वाली बात है कि, जिस उजैनी गांव को सती बिहुला की पावन जन्मस्थली माना जाता है, वहां आज तक उनकी स्मृति से जुड़ा कोई भी स्मारक, भव्य मंदिर या पहचान चिह्न सरकारी स्तर पर विकसित नहीं किया जा सका है. स्थानीय ग्रामीणों—ब्रह्मचारी राम, सुनील राम, सुभाष राम, प्रिंस राम, तूफानी राम, और मोहम्मद दहोगी आदि ने दर्द बयां करते हुए बताया कि, कुछ कतिपय ग्रामीणों द्वारा इस ऐतिहासिक प्राचीन पोखर और पवित्र खिरनय नदी के आसपास की भूमि का बड़े पैमाने पर अतिक्रमण कर लिया गया है, जिससे इस ऐतिहासिक धरोहर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है.

ग्रामीणों ने लिया संकल्प, आपसी सहमति से मुक्त कराएंगे जमीन और बनाएंगे भव्य मंदिर

सरकारी उपेक्षा से नाराज ग्रामीणों ने अब स्वयं इस पावन जन्मस्थली को बचाने का बीड़ा उठाया है. ग्रामीणों का कहना है कि, वे जल्द ही एक बड़ी बैठक आयोजित करने जा रहे हैं, जिसमें आपसी सहमति से माता बिहुला की जन्मभूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया जाएगा और वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण शुरू करने का प्रयास किया जाएगा. ग्रामीणों ने बताया कि, हर साल 17 अगस्त को बड़े पैमाने पर सती बिहुला के जन्मदिन का उत्सव पूरे क्षेत्र में मनाया जाता है, लेकिन उनकी अपनी वास्तविक जन्मस्थली पर किसी भी सरकारी या सामाजिक स्तर पर कोई विशेष आयोजन नहीं होता है. स्थानीय लोगों ने सरकार और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि, इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और विकास के लिए तुरंत ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि अंग जनपद की इस सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय पटल पर असली पहचान और सम्मान मिल सके.

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Vipin Thakur

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