मां भारती के लिए प्राण न्योछावर करने वाले कारगिल वीर रतन सिंह को किया गया शत्-शत् नमन

वीर जवान रतन सिंह का फाइल फोटो.
Kargil Hero : कारगिल के वीर सपूत हवलदार रतन सिंह की पुण्यतिथि पर उमड़ा जनसैलाब. उनकी वीरता और बलिदान की कहानी आज भी युवाओं को प्रेरित कर रही है.
गोपालपुर, भागलपुर से विपिन ठाकुर की रिपोर्ट
Kargil Hero : गोपालपुर थाना क्षेत्र के तिरासी गांव के वीर सपूत हवलदार रतन सिंह की पुण्यतिथि पर बड़ी संख्या में लोगों ने उनके स्मारक पर पहुंचकर श्रद्धासुमन अर्पित किए. इस दौरान लोगों ने कारगिल युद्ध में उनके अदम्य साहस और बलिदान को याद किया. ग्रामीणों का कहना है कि शहीद रतन सिंह की वीरता और देशभक्ति की मिसाल आज भी नई पीढ़ी को प्रेरित कर रही है.
कारगिल की ऊंचाइयों पर दिखाई थी अद्भुत वीरता
कारगिल युद्ध के दौरान 29 जून 1999 की मध्य रात्रि में बिहार रेजिमेंट को पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. करीब 16 हजार 470 फीट की ऊंचाई पर स्थित जुबेर टॉप चौकी को दुश्मनों से मुक्त कराने के अभियान में हवलदार रतन सिंह ने असाधारण साहस का परिचय दिया.
दो जुलाई तक चली भीषण लड़ाई में उन्होंने कई दुश्मन सैनिकों का मुकाबला किया. इस दौरान दो पाकिस्तानी कमांडो सहित कई घुसपैठिए मारे गए, जबकि बिहार रेजिमेंट के कई जवान घायल हुए. मातृभूमि की रक्षा करते हुए हवलदार रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए.
Kargil Hero : शहादत के बाद भी अधूरी है परिवार की उम्मीद
शहीद के ज्येष्ठ पुत्र रूपेश कुमार ने बताया कि शहादत के बाद परिवार को पांच एकड़ खेती योग्य जमीन देने की घोषणा की गई थी. इनमें से तीन एकड़ जमीन बिहार सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई, लेकिन आज तक परिवार को उस जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं मिल सका है.
उन्होंने बताया कि ऑनलाइन अभिलेखों में जमीन अब भी उनके पिता के नाम पर दर्ज है, लेकिन जमीन पर पूर्व से खेती कर रहे लोगों का कब्जा बना हुआ है. परिवार वर्षों से इस समस्या के समाधान की उम्मीद लगाए बैठा है.
फौज में नहीं जा सके, लेकिन युवाओं को बना रहे सैनिक
रूपेश कुमार बताते हैं कि पिता की शहादत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई. छोटे भाइयों, बहनों और मां की देखभाल के कारण उन्हें सेना में जाने का सपना छोड़ना पड़ा. बाद में उन्होंने शिक्षक बनकर युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करने का रास्ता चुना.
गांव में सिटी बजाकर युवाओं को जगाते थे रतन सिंह
ग्रामीणों के अनुसार, हवलदार रतन सिंह जब भी छुट्टी पर गांव आते थे तो सुबह चार बजे उठकर सिटी बजाते हुए गांव की गलियों में निकल पड़ते थे. उनकी आवाज सुनकर युवा मैदान में पहुंच जाते थे, जहां वे उन्हें दौड़, व्यायाम और सेना भर्ती की तैयारियों के बारे में मार्गदर्शन देते थे.
देशभक्ति और प्रेरणा की अमिट पहचान
15 अप्रैल 1959 को जन्मे रतन सिंह 28 फरवरी 1979 को भारतीय सेना में भर्ती हुए थे. अपने सेवा काल के दौरान उन्होंने मुख्यालय 42 पैदल ब्रिगेड और 46 बंगाल बटालियन एनसीसी में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.
आज उनकी शहादत सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है. उनकी वीरता की गाथा आने वाली पीढ़ियों को देश सेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी.
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