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जंगलों के बीच अवस्थित है माता राजगढ़ी का दरबार, पूरी करती हैं सबकी मुराद

Updated at : 27 Sep 2025 6:19 PM (IST)
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जंगलों के बीच अवस्थित है माता राजगढ़ी का दरबार, पूरी करती हैं सबकी मुराद

वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के जंगलों में स्थित कई ऐसी ऐतिहासिक धरोहर हैं, जहां राजा रानी, ऋषि मुनि व भक्तों के इतिहास जुड़ा हुआ है.

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हरनाटांड़. वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के जंगलों में स्थित कई ऐसी ऐतिहासिक धरोहर हैं, जहां राजा रानी, ऋषि मुनि व भक्तों के इतिहास जुड़ा हुआ है. यह टाइगर रिजर्व को गौरवान्वित करती हैं और आज भी देवी की सवारी बाघ मंदिरों के आस पास विचरण करते रहते हैं. राजगढ़ी देवी स्थान जहां नवरात्र में इस सिद्धपीठ में माता के दर्शन को भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो भक्त श्रद्धा भक्ति भाव से पूजा अर्चना करता है उनकी मंन्नतें पुरी होती है. कहा जाता है कि उस दौर में 52 गढ़ी के नगर में रहने वाले लोगों की आराध्य देवी राजगढ़ी माता ही थी. उनकी कृपा से क्षेत्र में सुख समृद्धि का राज था. बताया जाता है कि कालांतर में नगर समाप्त हो गए. लेकिन माता राजगढ़ी का यह मंदिर आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. यहां प्राचीन काल से देवी की उपासना सात पिंडियों के रूप में की जाती रही है, जो श्रीमद् देवी भागवत महापुराण और दुर्गा सप्तशती में वर्णित सप्तमातृका का रूप है. स्थानीय लोक-परंपरा में इन सप्त मातृकाओं की पूजा सात-बहन के रूप में भी की जाती है. यहां पहुंचने वाले भक्तों की हर मुराद माता पूरी करती है. मंदिर के पुजारी व 81 वर्षीय संत भागवत दास बताते है कि इस ऐतिहासिक देवी स्थान के चारों ओर अवस्थित खाई, कुएं से निकला सुरंग और आयताकार ईंटें इतिहास को खुद में समेटे हुए हैं. इस ऐतिहासिक देवी स्थल को किसी तारणहार कीक प्रतीक्षा है. माता राजगढ़ी भक्तों को कभी निराश नहीं करती है. बताते है कि मंदिर को संरक्षित करने के लिए एक न्यास का गठन किया गया है. जिसमें कई स्थानीय लोग शामिल है. राजगढ़ी देवी स्थान का ऐतिहासिक स्थानीय दिलीप कुमार राणा ने बताया कि वीटीआर के मदनपुर वन क्षेत्र के नौरंगिया जंगल स्थित राजगढ़ी देवी स्थान है, जो नौरंगिया चौराहे से करीब 1.5 किलोमीटर की दूरी पर जंगलों के बीच अवस्थित है. यह ऐतिहासिक शक्तिपीठ गौरवमयी अतीत को खुद में समेटे हुए है. बताया जाता है कि सबसे पहले 1209 ई. में पटखौली के पाठकों के पूर्वज भुआल राम पाठक यहां आदि-शक्ति की उपासना करते थे. बाद में बेतिया राज ने इस देवी स्थान को करीब सवा पांच एकड़ जमीन दी. वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के जंगलों के बीच अवस्थित यह देवी स्थान कई मायनों में खास है. मंदिर के चारों ओर अवस्थित खाई कौतूहल पैदा करती है. गढ़ी का निर्माण आयताकार ईंटों से हुआ है. मंदिर परिसर में अवस्थित कुआं भी अपने आप में रहस्यों को समेटे हुए है. कुएं से निकला सुरंग कहां जाता है यह आजतक कोई नहीं जान सका. फिलहाल दो सुरंग कुएं में देखने अभी दिखाई देते है. हालांकि आजतक इस अति प्राचीन गढ़ी पर किसी पुरातात्विक शोधकर्ता की नजर नहीं गयी है. दंत कथाओं के मुताबिक वर्षों पूर्व दरबार द्वार (विकृत नाम दरुरआबारी) 52 गढ़ी और 53 बाजारों को कहा जाता था. इन 52 गढ़ी में एक राजगढ़ी भी है. चंपारण के इतिहास के अनुसार 405 से 411 ई. के बीच यहां फाह्यान और 630 ई से 644 के बीच ह्वेनसांग ने दरबार द्वार की यात्रा कर यहां के समृद्ध नगर में रहने वाले लोगों की संस्कृति से रूबरू हुए. लंबे समय तक उपेक्षित होने के कारण खंडहर में तब्दील नौरंगिया निवासी वीरेंद्र मिश्रा, राजेश पाठक, उत्तिम शर्मा ने बताया कि राजगढ़ी की देवी दुर्गा, 13वीं शताब्दी के सामंत, दामोदर पाठक के भाई, ब्रह्मचारी भूपाल पाठक की आराध्य देवी थी. स्थानीय समुदाय द्वारा राजगढ़ी देवी के स्थान पर देवी दुर्गा के साथ भूपाल पाठक के ‘चौरा’ समाधि की भी पूजा की जाती है. तेरहवीं शताब्दी के आसपास जब भारत के उत्तरी भाग में दिल्ली सल्तनत का शासन था, उस समय नेपाल के बुटवल स्थित राजवंश के विरुद्ध यहां के स्थानीय प्रमुख पं. भूपाल पाठक ब्रह्म एवं उनके बड़े भाई पं. दामोदर पाठक ब्रह्म ने निशस्त्र विद्रोह किया था. कालांतर में इन पाठक द्वय के वंशज यहां के समीपवर्ती क्षेत्र जा बसे. इन पाठक वंश के लोगों के संरक्षण में रहने वाला यह क्षेत्र बाद में अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया और लंबे समय तक उपेक्षित रहने के कारण खंडहर में तब्दील हो गया. भारत के स्वतंत्रता के पश्चात भी यह स्थान उपेक्षित ही रहा. वहीं बगहा स्थित ब्रह्म-स्थान, पटखौली के पाठक समुदाय की वंशावली द्वारा प्राप्त विवरण के अनुसार 13वीं शताब्दी में इस क्षेत्र का प्रशासन एक स्थानीय ब्राह्मण भूपाल पाठक (अपभ्रंश नाम भुआल पाठक) द्वारा संचालित होता था. पर्यटन स्थल के रूप में किया जाएगा विकसित वाल्मीकिनगर के विधायक धीरेंद्र प्रताप उर्फ रिंकू सिंह ने बताया कि राजगढ़ी के इतिहास को सामने लाने का प्रयास किया जाएगा. इसके लिए सरकार को पत्र लिखा जा रहा है. जल्द ही पुरातत्व विभाग की टीम यहां पहुंचेगी. वाल्मीकिनगर को पर्यटन मैप से जोड़ने की दिशा में यह प्रयास सकारात्मक परिणाम लाएगा. बताते चलें कि राजगढ़ी भारतीय राज्य बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में स्थित प्राचीन ध्वंसावशेष से युक्त एक पुरातात्विक महत्व का स्थान है. जहां देवी दुर्गा का एक ऐतिहासिक मंदिर स्थित है. तिरहुत (प्राचीन नाम-तीरभुक्ति) प्रदेश में महा पुण्यप्रद नदी गंडक के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित इस स्थान को स्थानीय निवासी किसी गढ़ (दुर्ग) भी अनेक गांव स्थित हैं. इस बात की प्रबल संभावना है कि नौरंगिया या यही के किसी समीपवर्ती गांव को राजा सूर्यादित्य ने दान में दिया गया होगा.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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SATISH KUMAR

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