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भागवत कथा सुनने से सत्मार्ग पर चलने की मिलती है प्रेरणा : वैदेही जी महाराज

Updated at : 06 Jan 2026 10:07 PM (IST)
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भागवत कथा सुनने से सत्मार्ग पर चलने की मिलती है प्रेरणा : वैदेही जी महाराज

बखरी के रामपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन मंगलवार को कथा वाचिका पूज्य श्री वैदेही जी महाराज ने कहा कि भागवत कथा सुनने से व्यक्ति के मन के विकार दूर हो जाते हैं और सत्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है.

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बखरी. बखरी के रामपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन मंगलवार को कथा वाचिका पूज्य श्री वैदेही जी महाराज ने कहा कि भागवत कथा सुनने से व्यक्ति के मन के विकार दूर हो जाते हैं और सत्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है.महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का वर्णन की है,जिसमें वामन अवतार,ध्रुव चरित्र और कंस के अत्याचार जैसे प्रसंगों के साथ-साथ भगवान राम के जन्म की कथाएं सुनाई गई हैं.जिससे श्रद्धालु भक्ति में डूब रहे और कृष्ण जन्म के जयकारे लगा रहे थे.इससे पहले सोमवार की देर रात उन्होंने परीक्षित की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि वह कलिकाल के प्रभाव से समीर ऋषि के गले में मरे हुए सर्प की माला डालने से श्राप ग्रसित हो गए थे.भागवत कथा श्रवण से ही राजा परीक्षित परम गति को प्राप्त हुए.इस कलिकाल में श्रीमद्भागवत कथा श्रवण,राम नाम संकीर्तन ही मुक्ति का सहज मार्ग है. जिसको सुनकर पंडाल में श्रोता भाव विभोर हो गये.कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए महाराज ने कहा कि राजा परीक्षित दिग्विजय के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन कर रहे थे.उसी समय देखा एक बैल जिसके तीन पैर कटे थे. सामने गो माता रो रही थी.यह बैल कोई और नहीं बल्कि धर्म और गो माता धरती का स्वरूप थी.उसी समय एक काला आदमी तलवार लिए बैल के चौथे पैर को ही काटने दौड़ा.राजा परीक्षित उस काले आदमी अर्थात कलिकाल को मारने दौड़े और कहा हमारे राज्य से चले जाओ.कलिकाल ने कहा महाराज समूची धरा तो आपका ही राज्य है. मुझे कहीं स्थान दें,जहां मैं रह सकूं. राजा परीक्षित ने कलिकाल को रहने के चार स्थान दिए.पहला जहां वेश्यावृति हो,दूसरा मदिरापान हो,तीसरा जहां हिसा हो और चौथा जहां अनीति से इकट्ठा किया गया स्वर्ण हो.इन चारों स्थानों पर कलिकाल का निवास स्थान है. कालांतर में राजा परीक्षित अपने पूर्वजों का खजाना देख रहे थे.उसी समय जरासंध का स्वर्ण मुकुट सिर पर रखा गया.स्वर्ण मुकुट रखते ही कलिकाल सवार हो गया और राजा परीक्षित हिसा की तरफ बढ़ने लगे और शिकार खेलने जंगल चले गए. शिकार खेलते खेलते भूख प्यास से व्यथित होकर पानी की तलाश में भटक रहे थे.उसी क्षण एक संत का आश्रम दिखा,आश्रम में गए तो संत ध्यान में लीन थे.राजा को घमंड आ गया कि मैं यहां का राजा हूं और प्रजा के सामने राजा भगवान का स्वरूप है.इसके बाद भी यह महात्मा शांत चित्त बैठा है.राजा परीक्षित ने एक सर्प मारकर संत समीर के गले में लपेट कर चले गए.इस बारे में जब संत पुत्र श्रृंगी को जानकारी हुई तो वो क्रोध में नदी का जल लेकर उसने श्राप दे दिया कि जिसने यह कुकृत्य किया है.सात दिन में इसी सर्प के काटने से उसकी मृत्यु हो जाएगी. इसी सर्पदंश की इस घटना का वृतांत सुन संत महात्मा इकट्ठे हुए और महाराज परीक्षित की मुक्ति का उपाय सोचने लगे.महाराज परीक्षित की मुक्ति के लिए गंगा तट पर 7 दिनों तक सुखदेव महाराज ने परीक्षित को श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कराया.कथा श्रवण से राजा परीक्षित परमधाम को चले गए.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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MANISH KUMAR

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