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झाल, मांदर व नगाड़े की थाप पर थिरक रहा आदिवासी समुदाय

Updated at : 10 Jan 2026 7:03 PM (IST)
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झाल, मांदर व नगाड़े की थाप पर थिरक रहा आदिवासी समुदाय

कटोरिया व चांदन प्रखंड के आदिवासी बाहुल गांवों में सोहराय पर्व की धूम मचनी शुरू हो गयी है

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कटोरिया, चांदन सहित आदिवासी बाहुल गांवों में तीन दिवसीय सोहराय शुरू

कटोरिया

कटोरिया व चांदन प्रखंड के आदिवासी बाहुल गांवों में सोहराय पर्व की धूम मचनी शुरू हो गयी है. क्षेत्रीय प्रधान के निर्णय के अनुसार तीन दिवसीय अनुष्ठान वाला यह पर्व कहीं 10 जनवरी शनिवार को शुरू हुआ, तो कहीं 11 जनवरी रविवार से भी पर्व का शुभारंभ होगा. इस पर्व को लेकर आदिवासी बाहुल गांवों में उत्सवी माहौल कायम हो चुका है.

ऐसे मनाया जाता है पर्व

सोहराय पर्व के पहले दिन आदिवासी समाज के सभी स्त्री-पुरुष व बच्चे नदी में स्नान कर आदिवासी गीत ‘तीही दोलेय उम का नाम, दुल दुली पुखुरी रे’ गाते हुए जहार थान में विधि-विधान के साथ पूजा कर मुर्गी की बलि देते हैं. उस प्रसाद को जंगल में ही पूजा-स्थल पर सिर्फ पुरुष ग्रहण करते हैं. इस पूजा के दौरान प्रसाद के रूप में मदिरा भी ग्रहण किया जाता है. पर्व का दूसरा दिन होता है ‘गोहाल पूजा’. इस दिन रिश्ते की सभी बहनें व भगना-भगिनी आमंत्रण पर पहुंते हैं. घर में रखे कृषि यंत्र जुआठ की सफाई नदी में करके घर लाया जाता है. उसके बाद सूअर व मुर्गी की बलि दी जाती है. इस प्रसाद का वितरण पड़ोसियों के बीच भी किया जाता है.

पर्व में होती है प्रतियोगिता

सोहराय पर्व का अंतिम व तीसरा दिन ‘बरध-खूट्टा’ कहलाता है. यह दिन प्रतियोगिता व मनोरंजन का होता है. इसमें घर के बाहर दरवाजे पर बड़ा सा गड्ढा खोद कर बांस का खूंटा खड़ा किया जाता है. गड्ढे की खाली जगह को मिट्टी की जगह लगभग डेढ मन धान से भरकर खूंटे में एक बैल बांध दिया जाता है. खूंटे के उपरी सिरे में नकदी व पकवान की पोटली बांध कर लटकाया जाता है. फिर खूंटे में लटके इनाम को जीतने के लिए प्रतियोगिता शुरू हो जाती है. वहीं बगल में युवक-युवतियों की टोली घूम-घूम कर नगाड़ा, मांदर व झाल बजाते हुए आदिवासी गीत ‘दइना-दइना मरांग दे, दला से दला ओडोंग लेंड मेंय’ गाते हुए खूंटे का चक्कर भी लगाती हैं. नगाड़ा व झाल की शोर से खूंटे में बंधा बैल मारने के लिए दौड़ता है. जबकि गांव के युवक नकदी व पकवान के लिए मौका देख कर खूंटे पर चढने का प्रयास करते हैं. यदि युवक ईनाम नहीं जीत पाते हैं, तो ईनाम के साथ-साथ गड्ढे में भरा धान भी आमंत्रित दामाद को दे दिया जाता है. विपत्तियों से अपने भाई की रक्षा

देवासी पंचायत के हथगढ गांव निवासी समाजसेवी सोनेलाल किस्कू ने बताया कि पर्व के अनुष्ठान के दौरान बहनें साजिश व विपत्तियों से अपने भाई की रक्षा करने की मांग अपने कुल देवता यानि जान गुरु से करती हैं. सोहराय पर्व को लेकर बंगालगढ, आरपत्थर, बुढीघाट, जनकपुर, सलैया, हथगढ, बाबूकुरा, तेतरिया, नैयाडीह, लकरामा, मोचनमा, पलनियां, कचनार, हजारी, कैथावरण, लेटवा, मुरलीकेन, बुढवाबथान, मोथाबाड़ी, लौंगांय आदि गांवों में जश्न का माहौल बन चुका है. सोहराय की समाप्ति पर होता है शिकार

तीन दिवसीय सोहराय पर्व की समाप्ति के उपरांत आदिवासी बाहुल कई गांवों के पुरुष व युवा वर्ग पारंपरिक हथियार जैसे तीर-धनुष, फरसा, कटारी, कुल्हाड़ी आदि से लैश होकर सामूहिक रूप से शिकार करने निकलते हैं. शिकार के दौरान घरेलू पालतू कुत्ते को भी साथ रखा जाता है. जो शिकार के दौरान जंगली जानवरों जैसे सूअर, खरहा सहित अन्य वन्य जीवों को घेरने में मदद करता है. शिकार के उपरांत शिकार के गए जानवरों के हिस्से में सहयोगी कुत्ते को भी हिस्सा बांटा जाता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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SHUBHASH BAIDYA

लेखक के बारे में

By SHUBHASH BAIDYA

SHUBHASH BAIDYA is a contributor at Prabhat Khabar.

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