मंदार के लाल मंदिर का 90 साल पुराना राज, पंचमुखी महादेव के दरबार में छिपी है आस्था व सामाजिक समरसता की कहानी
मंदार तराई मे स्थित बिरला मंदिर में स्थापित पंचमुखी शिवलिंग.
बांका के मंदार पर्वत पर स्थित बिरला मंदिर, जिसे लाल मंदिर भी कहते हैं, समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ा है. यहाँ के पंचमुखी महादेव के दर्शन सिर्फ आस्था ही नहीं, सामाजिक समरसता का भी संदेश देते हैं. जानिए इस मंदिर का अनोखा इतिहास, जहाँ हर वर्ग का स्वागत है.
बांका के मंदार पर्वत की पहचान समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ी है. इसी पवित्र पर्वत की तलहटी में बना बिरला मंदिर आज भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है. सावन में यहां पंचमुखी महादेव का रुद्राभिषेक और विशेष श्रृंगार होता है. दूर-दराज से भक्त मनोकामना लेकर पहुंचते हैं. लेकिन इस मंदिर की कहानी में एक ऐसा अध्याय भी है, जो इसे दूसरे शिव मंदिरों से अलग बनाता है. यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक समरसता के संदेश का भी प्रतीक रहा है.
पंचमुखी महादेव के पांच स्वरूपों का रहस्य

मंदार पर्वत को सनातन परंपरा में समुद्र मंथन की धरती माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया था. इसी कारण वे नीलकंठ कहलाए.
मंदार की इसी पौराणिक भूमि पर पंचमुखी महादेव की स्थापना श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखती है. गुरुधाम के विद्वान पंडित गंगाधर मिश्रा और नंदन शर्मा के अनुसार पंचमुखी शिव के पांच स्वरूप सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान माने जाते हैं.
इन पांच स्वरूपों को पांच दिशाओं और पंचतत्व से जोड़ा जाता है. पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के साथ सृष्टि, पालन, संहार, तिरोधान और अनुग्रह की अवधारणाएं भी इनसे जुड़ी मानी जाती हैं.
एक धर्मशाला से शुरू हुई थी लाल मंदिर की कहानी
इतिहासकार उदयेश रवि के अनुसार बिरला मंदिर के निर्माण की कहानी वर्ष 1892-93 के एक प्रसंग से जुड़ती है. उस समय उद्योगपति बलदेव दास बिरला कलकत्ता में व्यापार करते थे.
एक दिन उन्होंने वैष्णव श्रद्धालुओं के एक जत्थे को 'जय हरि, जय मधुसूदन' का उद्घोष करते हुए मंदार की ओर जाते देखा. अपने मुंशी गिरधारीलाल से जानकारी लेने पर पता चला कि श्रद्धालु मंदार स्थित भगवान मधुसूदन के दर्शन के लिए जा रहे हैं.
बलदेव दास बिरला स्वयं वैष्णव थे. वे भी मंदार पहुंचे, लेकिन वहां श्रद्धालुओं के ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी. इसके बाद उनके मन में यात्रियों के लिए धर्मशाला बनाने का विचार आया.
पहले बनी खपरैल की बड़ी झोपड़ी
समय बीतने के बाद इस संकल्प को जमीन मिली. मंदार में जमीन लेकर धर्मशाला के लिए खपरैल की बड़ी झोपड़ी बनाई गई. आगे चलकर बिरला परिवार ने इस स्थान को व्यापक धार्मिक और सामाजिक उद्देश्य से विकसित करने का निर्णय लिया.
यही पहल आगे चलकर उस मंदिर के निर्माण की वजह बनी, जिसे आज लोग बिरला मंदिर या लाल मंदिर के नाम से जानते हैं.
1934 में मंदिर निर्माण के पीछे जुड़ा सामाजिक संदेश
मंदिर के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय वर्ष 1934 से जुड़ा है. महात्मा गांधी के देवघर प्रवास और वैद्यनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश से जुड़े विवाद के दौर ने घनश्याम दास बिरला को प्रभावित किया.
इसके बाद उन्होंने धर्मशाला की जगह ऐसा शिव मंदिर बनवाने का संकल्प लिया, जहां समाज के सभी वर्गों के लोग प्रवेश कर सकें.
दिल्ली में बन रहे बिरला मंदिर के कारीगरों को मंदार लाकर निर्माण कार्य कराया गया. स्थानीय परंपरा के अनुसार मंदिर का निर्माण वर्ष 1934 में पूरा हुआ. काशी से लाए गए बिल्लौरी पंचमुखी शिवलिंग की स्थापना काशी के पंडितों ने की.
बताया जाता है कि स्थापना के अवसर पर जुगल किशोर बिरला, रामेश्वर दास बिरला और घनश्याम दास बिरला भी मौजूद थे.
शिलापट्ट पर दर्ज है समानता का संदेश

लाल मंदिर की खासियत इसकी स्थापत्य कला और पंचमुखी शिवलिंग के साथ सामाजिक संदेश भी है. मंदिर के बाहर लगे शिलापट्ट पर सभी जाति-वर्गों के लिए मंदिर समर्पित करने और छुआछूत के विरोध का संदेश अंकित होने की बात कही जाती है.
मंदिर की प्रतिष्ठा के बाद स्थानीय संथाल समुदाय के एक व्यक्ति से पहली पूजा कराने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है. यह परंपरा मंदिर के धार्मिक स्वरूप से आगे बढ़कर सामाजिक समरसता की भावना को सामने रखती है.
बिरला परिवार के सेवा भाव की भी दिखती है झलक
घनश्याम दास बिरला के नाम से उनके पुत्र बसंत कुमार बिरला को लिखे एक पत्र का भी लंबे समय से उल्लेख होता रहा है. इसमें धन को मौज-शौक के बजाय जनसेवा में लगाने, स्वास्थ्य को सर्वोच्च संपदा मानने, इंद्रियों पर नियंत्रण रखने और अगली पीढ़ी को जिम्मेदारी का संस्कार देने जैसे विचारों की चर्चा की जाती है.
हालांकि पत्र की प्रामाणिकता और इससे जुड़े व्यापक दावों को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं. फिर भी इसमें व्यक्त विचार बिरला परिवार की सेवा और परोपकार से जुड़ी सार्वजनिक छवि से मेल खाते हैं.
1985 में जर्जर मंदिर का हुआ जीर्णोद्धार
समय के साथ मंदिर की स्थिति जर्जर होने लगी. बौंसी के कवि प्राण मोहन 'प्राण' ने इसके संरक्षण के लिए प्रयास शुरू किए. इसके बाद वर्ष 1985 में केके बिरला ने मैनेजर प्रदीप सिंह को भेजकर मंदिर की मरम्मत करायी.
स्थानीय लोगों के अनुसार इस कार्य में कवि प्राण मोहन 'प्राण' का भी सहयोग रहा. मंदिर से जुड़े पुराने विवरणों में बिरला परिवार के राजा बलदेव दास बिरला के इस धार्मिक धरोहर से जुड़ाव का भी उल्लेख मिलता है.
सावन में उमड़ती है श्रद्धा, हर शनिवार बंटता है खिचड़ी प्रसाद
वर्तमान समय में मंदिर में पंचमुखी महादेव की पूजा के साथ मां बगलामुखी की आराधना भी होती है. पिछले दो वर्षों से प्रत्येक शनिवार खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और श्रद्धालुओं के बीच नि:शुल्क प्रसाद वितरित किया जाता है.
सावन के महीने में मंदिर की रौनक देखते ही बनती है. प्रतिदिन रुद्राभिषेक और विशेष श्रृंगार किया जाता है. बड़ी संख्या में श्रद्धालु पंचमुखी महादेव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और अपनी मनोकामना लेकर पूजा-अर्चना करते हैं.
आस्था, इतिहास और समरसता का संगम है लाल मंदिर
मंदार की तराई में स्थित बिरला मंदिर की पहचान सिर्फ एक प्राचीन शिवालय के रूप में नहीं है. यहां पंचमुखी महादेव की आध्यात्मिक महत्ता है तो मंदिर के इतिहास में सामाजिक समानता और सेवा का संदेश भी दर्ज है.
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लेखक के बारे में
By संजीव कुमार
संजीव कुमार पाठक प्रिंट माध्यम में 18 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. बौंसी (बांका) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.
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