झाल, मांदर व नगाड़े की थाप पर थिरक रहा आदिवासी समुदाय

Published at :11 Jan 2016 9:48 PM (IST)
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झाल, मांदर व नगाड़े की थाप पर थिरक रहा आदिवासी समुदाय

झाल, मांदर व नगाड़े की थाप पर थिरक रहा आदिवासी समुदाय – आज से शुरू हुआ तीन दिवसीय सोहराय पर्व- संथाली बहनें करेगी भाई के रक्षा की कामनाफोटो 11 बीएएन 66 गांवों में खुशी से झूमते आदिवासीप्रतिनिधि, कटोरिया कटोरिया और चांदन प्रखंड के आदिवासी बाहुल गांवों में सोहराय पर्व की धूम मची है़ क्षेत्रीय प्रधान […]

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झाल, मांदर व नगाड़े की थाप पर थिरक रहा आदिवासी समुदाय – आज से शुरू हुआ तीन दिवसीय सोहराय पर्व- संथाली बहनें करेगी भाई के रक्षा की कामनाफोटो 11 बीएएन 66 गांवों में खुशी से झूमते आदिवासीप्रतिनिधि, कटोरिया कटोरिया और चांदन प्रखंड के आदिवासी बाहुल गांवों में सोहराय पर्व की धूम मची है़ क्षेत्रीय प्रधान के निर्णय के अनुसार तीन दिवसीय अनुष्ठान वाला यह पर्व कहीं 11 जनवरी सोमवार को शुरू हुआ़ तो कई टोलों में रविवार से ही सोहराय पर्व का शुभारंभ हो चुका है़ इस पर्व को लेकर आदिवासी बाहुल गांवों में उत्सवी माहौल बन चुका है़ ऐसे मनाया जाता है पर्वपर्व के पहले दिन आदिवासी समाज के सभी स्त्री-पुरूष व बच्चे नदी में स्नान कर आदिवासी गीत ‘तीही दोलेय उम का ना, दुल दुली पुखुरी रे़.’ गाते हुए जहार थान में विधि विधान के साथ पूजा कर मुर्गी की बलि देते हैं. उस प्रसाद को जंगल में ही पूजा-स्थल पर सिर्फ पुरूष ग्रहण करते हैं. इस पूजा के साथ ही मदिरा का दौर भी शुरू हो जाता है़ पर्व का दूसरा दिन होता है ‘गोहाल-पूजा’. इस दिन रिश्ते की सभी बहनें व भगना-भगिनी आमंत्रण पर पहुंचते हैं. घर में रखे कृषि यंत्र जुआठ की सफाई नदी में करके घर लाया जाता है़ उसके बाद सूअर व मुर्गी की बलि दी जाती है़ इस प्रसाद का वितरण पड़ोसियों के बीच भी किया जाता है़ होती है प्रतियोगितापर्व का अंतिम और तीसरा दिन कहलाता है ‘बरध-खुट्टा’. यह दिन प्रतियोगिता और मनोरंजन का होता है़ इसमें घर के बाहर दरवाजे पर बड़ा सा गड्ढा खेद कर बांस का खूंटा खड़ा किया जाता है़ गड्ढे की खाली जगह को मिट्टी की जगह लगभग डेढ़ मन धान से भर कर खूंटे में एक बैल बांध दिया जाता है़ खूंटे के उपरी सिरे में नकदी व पकवान की पोटली बांध कर लटकाया जाता है़ फिर प्रतियोगिता शुरू हो जाती है़ खूंटे में लटके ईनाम को जीतने के लिए़ वहीं बगल में युवक-युवतियों की टोली घूम-घूम कर नगाड़ा, मांदर व झाल बजाते हुए आदिवासी गीत ‘दईना-दईना मरांग दे, दला से दला ओडोंग लेंड मेंय.’ गाते हुए खूंटे का चक्कर भी लगाती है़ नगाड़ा व झाल की शोर से खूंटे में बंधा बैल मारने के लिए दौड़ता है़ जबकि गांव के युवक नकदी व पकवान के लिए मौका देख खूंटे पर चढ़ने का प्रयास करते हैं. यदि युवक ईनाम नहीं जीत पाते हैं, तो ईनाम के साथ-साथ गड्ढे में भरा धान आमंत्रित दामाद को दे दिया जाता है़ कहते हैं ग्रामीणइस संबंध में जनकपुर गांव के गणेश टुडु, सुरेंद्र टुडु आदि ने बताया कि पर्व के अनुष्ठान के दौरान बहनें साजिश व विपत्तियों से अपने भाई की रक्षा करने की मांग अपने कुल देवता से करती है़ सोहराय पर्व को लेकर बंगालगढ़, आरपत्थर, बुढ़ीघाट, जनकपुर, सलैया, बाबूकुरा, तेतरिया, नैयाडीह, लकरामा, मोचनमा, पलनिया, कचनार, हजारी, कैथावरण, लेटवा, मुरलीकेन, बुढ़वाबथान, मोथाबाड़ी, लौंगाय आदि गांवों में जश्न का माहौल है़

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