पर्यावरण से खिलवाड़ हो सकता है विनाशकारी: प्राचार्य

Published at :28 Nov 2015 10:38 PM (IST)
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पर्यावरण से खिलवाड़ हो सकता है विनाशकारी: प्राचार्य

पर्यावरण से खिलवाड़ हो सकता है विनाशकारी: प्राचार्य फोटो 28 बांका 17 सेमिनार के समापन सत्र को संबोधित करते प्राचार्य,18 सेमिनार में उपस्थित छात्र- छत्राए व अन्य प्रतिनिधि, बांका भारतीय चिंतन में पर्यावरण व मानव अस्तित्व एक चुनौती विषय पर पीबीएस कॉलेज में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के दूसरे व अंतिम दिन महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ […]

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पर्यावरण से खिलवाड़ हो सकता है विनाशकारी: प्राचार्य फोटो 28 बांका 17 सेमिनार के समापन सत्र को संबोधित करते प्राचार्य,18 सेमिनार में उपस्थित छात्र- छत्राए व अन्य प्रतिनिधि, बांका भारतीय चिंतन में पर्यावरण व मानव अस्तित्व एक चुनौती विषय पर पीबीएस कॉलेज में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के दूसरे व अंतिम दिन महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ सुभाष चंद्र सिंह ने कहा कि यह जो विषय है पर नयी तरह की बहस छेडने की आवश्यकता है, जिससे उच्च श्रृंखला की की शुरुआत हो सके. समस्याएं गिनाने से समाधन नहीं होगा. इस पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है. जिले, राज्य व देश के विकास के लिए जंगल काटना हमारे लिए जरूरी है, लेकिन पौधरोपण उससे भी ज्यादा जरूरी है. हमारे जिले में वन विभाग के द्वारा पौधरोपण हुआ है. इसके लिए मैं वन विभाग की अधिकारी को धन्यवाद देता हूं. वृक्ष काटे लेकिन सामाजिक वाणिकी करे. आज से हम यह संकल्प ले कि हमारे पास जितनी जमीने हैं उसके एक चौथाई में सामाजिक वाणिकी करेंगे शेष में खेती. फैक्टरी लगाने से गैस उत्सर्जन होता है तो क्या हो फैक्टरियां बंद करा दिया जाय. यदि फैक्टरियां बंद होती है तो विकास नहीं होगा और विकास नहीं होगा तो देश कैसे आगे बढ़ेगा और देश के अन्य मुल्कों से विकास के मामले में आगे बढ़ पायेंगे. यदि कल करखाने लगाने से पर्यावरण दूषित हो रहा तो इसके प्रदूषण को रोकने के लिए कुछ ऐसा उपाय करना होगा, जिससे इसका समाधान हो सके. तभी समुद्र में एक बूंद की तरह हमारा योगदान हो सकेगा. साइंस फॉर सोसाइटी के राज्य उपाध्यक्ष प्रो डाॅ एसकेपी सिन्हा ने कहा कि पूर्वजों के द्वारा दिये गये संस्कार का हम उपयोग करे. न कि दुरुपयोग तभी पर्यावरण संरक्षित रह सकता है और पर्यावरण संरक्षित रह सकता है. सभ्यता के विकास के साथ साथ पर्यावरण स्वरूप में परिवर्तन तो होते ही हैै, लेकिन परिवर्तन ऐसा और इस तरीके से हो कि जैव विविधता का संरक्षणकारी हो न कि विनाशकारी हमे अपने संसाधनों का तार्किक उपयोग करना है. ताकि वे आने वाली सैकड़ों पीढ़ियों के लिए भी उपलब्ध हो. प्रदूषण नियंत्रण के नये नये उपायों की खोज होनी चाहिए कृषि योग्य भूमि की कमी की स्थिति में हमे कृषि की थ्री टायर तकनीक को अपना चाहिए वर्षा जल हार्वेस्टिंग, ऑर्गेनिक खेती, प्लांट टीसू कल्चर, हाईब्रिडाइजेशन के आधुनिक तकनिक को अपनाने की आवश्यकता है. तभी हम इसमें सहभागी बन सकेंगे. शोध छात्रा कुमारी अर्पणा ने विचार प्रकट करते हुए कहा कि धूम्रपान एवं अन्य अस्वास्थ्यकर आदतों के कारण वायु प्रदूषण बढ़ रहा है. खेसर हाई स्कूल की विज्ञान शिक्षिका मतता कुमारी ने कहा कि प्राचीन काल से भारतीय दर्शन में पर्यावरण एवं मानव जीवन के बीच सह अस्तित्व का भाव प्रदर्शित किया गया. इस लिए वृक्षों की पूजा का हमारी संस्कृति में महत्व दिया गया है. जेपी कॉलेज नारायणपुर से आये प्राध्यापक राकेश कुमार झा ने कहा कि वनों की अंधाधुन कटाई, औद्योगिक इकाईयों के द्वारा कार्बन उत्सर्जन एवं कचरा निर्माण के कारण होने वाले वायुमंडलीय प्रदूषण का विनाशकारी दुष्प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ रहा है. महाविद्यालय के अतिथि शिक्षक प्रो मनीष कुमार ने अपने शोध पत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में पर्यावरण सुरक्षा संबंधी बनायें गये नियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि आवश्यकता इस बात है कि बनाये नियमों का शक्ति से पालन हो. महाविद्यालय के सेवानिवृत पूर्व प्राचार्य प्रो कौशल कुमार सिंह ने भारतीय दर्शन, वेद, पुराण, गीता जैसे, धार्मिक ग्रंथों के उल्लेख के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया कि हम प्रकृति के मूल भूत सिद्धांतों से अपना तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं. पर्यावरण पर आसन्न संकट मानव की अपनी गलत जीवन शैली का दुष्परिणाम है. कार्यक्रम का संचालन कर डाॅ पवन सिंह किया. मौके पर कार्यक्रम के संयोजक प्रो राजेश कुमार मिश्रा, सह संयोजक प्रो अनीता गुप्ता, शिक्षक संघ सचिव विश्वजीत कुमार सिंह, प्रो जीपी श्रीवास्तव, प्रो एसएस ठाकुर, सुधीर कुमार झा, हरेंद्र कुमार सिंह, विशाल कुमार सिंह, एनके प्रियदर्शी, अरविंद कुमार सिंह, समरेश कुमार सिंह, अनूप, राजदूबे, पवन, कृष्णा, शिल्पी, कादंबिनी आदि उपस्थित थे.

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