नामकरण की राजनीति में उलझा औरंगाबाद, हश्र क्या होगा?

Published by : Vivek Pandey Updated At : 03 Jun 2026 11:40 AM

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Aurangabad News: ‘देव’ बनाम ‘आदित्य नगर’ की मांग पर जिले में दो खेमे सक्रिय, सहमति के अभाव में आंदोलन की सफलता पर सवाल

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(औरंगाबाद से सुजीत कुमार सिंह की रिपोर्ट)

Aurangabad News: औरंगाबाद जिले का नाम बदलने की मांग को लेकर अब खुलकर गुटबाजी सामने आने लगी है. एक पक्ष जिले का नाम “देव” रखने की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष “आदित्य नगर” के नाम पर जोर दे रहा है. दोनों समूह लगातार बैठकें कर रहे हैं, समर्थन जुटा रहे हैं और अपने-अपने तर्कों के साथ जनप्रतिनिधियों तथा आम लोगों को जोड़ने की कोशिश में लगे हैं. ऐसे में जिले में नामकरण का मुद्दा चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है.

इतिहास से नहीं लिया सबक, पहले भी विवाद में अटकी थी पहल

हालांकि इतिहास बताता है कि जब किसी जनहित के मुद्दे पर व्यापक सहमति नहीं बन पाती, तो उसका परिणाम अक्सर अधूरा ही रह जाता है. जिले में रमेश चौक पर राजा नारायण सिंह की आदमकद प्रतिमा स्थापित करने को लेकर भी कभी दो गुट आमने-सामने आ गए थे। विवाद और खींचतान के कारण वह पहल अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी और उस दौर में स्थापित दूसरी प्रतिमा आज भी उपेक्षा का शिकार बनी हुई है.

पदयात्रा और ज्ञापन के जरिए समर्थन जुटाने की होड़

अब एक बार फिर वैसी ही स्थिति बनती दिखाई दे रही है. “देव” नाम के समर्थक लगातार पदयात्रा निकालकर जनसमर्थन जुटाने में लगे हैं, जबकि “आदित्य नगर” की मांग करने वाले विभिन्न जनप्रतिनिधियों से मुलाकात कर ज्ञापन सौंप रहे हैं.

दोनों पक्ष अपने-अपने अभियान को तेज कर रहे हैं, लेकिन किसी साझा मंच या सर्वसम्मति की दिशा में अभी तक कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दे रही है.

बुद्धिजीवियों ने दी सहमति बनाने की सलाह

इस बीच जिले के समाजसेवी, बुद्धिजीवी और शिक्षाविद भी असमंजस की स्थिति में हैं. उनका मानना है कि नाम चाहे “देव” हो या “आदित्य नगर”, सबसे महत्वपूर्ण बात जिले की ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और जनभावनाओं का सम्मान है. इसके लिए किसी भी निर्णय से पहले व्यापक सहमति बनना आवश्यक है.

जनता की नजरें आंदोलन के भविष्य पर

फिलहाल आम जनता यह देख रही है कि औरंगाबाद के नाम परिवर्तन को लेकर वास्तविक जनआंदोलन खड़ा हो रहा है या फिर यह मुद्दा केवल राजनीतिक और गुटीय प्रतिस्पर्धा तक सीमित रह जाएगा.

यदि सभी पक्ष समय रहते एकमत नहीं हुए, तो आशंका है कि “देव” और “आदित्य नगर” दोनों ही नाम बैठकों, नारों और ज्ञापनों तक सिमटकर रह जाएं और नाम परिवर्तन की मांग अपने लक्ष्य तक न पहुंच सके.

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लेखक के बारे में

By Vivek Pandey

विवेक रंजन पांडेय का जन्म और पालन-पोषण बिहार के गौरवशाली इतिहास और ज्ञान की भूमि नालंदा में हुआ. इसी पावन धरती के संस्कारों ने उन्हें समाज और व्यवस्था को गहराई से देखने का नजरिया दिया. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को करियर बदलने के लिए उन्होंने पटना के आर्यभट्ट विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की. पिछले 7 वर्षों से टीवी चैनल के जरिए रिपोर्टिंग फील्ड में लगातार सक्रिय हैं. Network 10 National News Channel से करियर की शुरुआत की. उसके बाद कई संस्थानों में काम किया. शिक्षा और राजनीति के साथ कृषि, महिला सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर विशेष रूचि रखते हैं. पत्रकारिता की बारीकियों को सीखा और ग्राउंड जीरो पर रहकर जनता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. वर्तमान में Prabhat Khabar के माध्यम से बिहार की खबरों को एक नया आयाम दे रहे हैं. वे बिहार की राजनीति के साथ-साथ देश की सियासी हलचलों पर भी पैनी नजर रखते हैं. अपने शानदार करियर में उन्होंने ​बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जब वह उप मुख्यमंत्री थे तब इंटरव्यू किया. इसके साथ कैबिनेट के अधिकांश प्रमुख मंत्रियों का विशेष इंटरव्यू किया है. ​बिहार के शीर्ष नेताओं और नौकरशाहों को बहुत करीब से देखा, समझा और उनकी नीतियों का निष्पक्ष विश्लेषण किया. ​जटिल राजनीतिक घटनाक्रमों को बेहद सरल भाषा में जनता के सामने पेश किया है.

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