अफसरों की अनदेखी से खतरे में मासूमों की जान

Updated at : 31 Aug 2017 10:35 AM (IST)
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अफसरों की अनदेखी से खतरे में मासूमों की जान

सुस्त प्रशासन की ओर से नहीं हो रही कोई कार्रवाई औरंगाबाद सदर : स्कूल प्रबंधन, पुलिस और प्रशासन की लापरवाही के कारण जिले में अवैध स्कूल वैन और आॅटो धड़ल्ले से चल रहे हैं. स्कूल बसों के परिचालन में भी मानकों पर किसी का ध्यान नहीं है. यही कारण है कि दो सप्ताह पूर्व स्कूल […]

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सुस्त प्रशासन की ओर से नहीं हो रही कोई कार्रवाई
औरंगाबाद सदर : स्कूल प्रबंधन, पुलिस और प्रशासन की लापरवाही के कारण जिले में अवैध स्कूल वैन और आॅटो धड़ल्ले से चल रहे हैं. स्कूल बसों के परिचालन में भी मानकों पर किसी का ध्यान नहीं है. यही कारण है कि दो सप्ताह पूर्व स्कूल बस से कुचल कर एक बच्चे की मौत की घटना भी घट चुकी है.
स्कूली बच्चों को ढोनेवाले अधिकतर वाहन यातायात नियमों का अनुपालन करते नहीं दिखते हैं. शहर में ऐसे अनेक स्कूल हैं, जिनके पास अपनी परिवहन व्यवस्था नहीं है. इसके कारण इन स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चों के अभिभावकों को मजबूरीवश इन अवैध वाहनों का सहारा लेना पड़ता है. अवैध वैनचालक अपने वाहन में क्षमता से ज्यादा बच्चों को ठूंस कर लाते ले जाते हैं. जिले में स्कूली बच्चों को ढोने के लिए सैकड़ों की संख्या में वैन और आटो अवैध रूप से चल रहे हैं, लेकिन इन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है.
तीन महीनों में नहीं हुई है कोई कार्रवाई : स्कूली बच्चों को ले जाने वाले वाहनों द्वारा नियमों की धज्जियां उड़ाने पर कितनी कार्रवाई होती है, इसका अंदाजा हाल में हुए घटना को देख कर लगाया जा सकता है. डीटीओ कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार पिछले तीन महीने में अवैध स्कूली वाहनों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है. डीटीओ विभाग के सुस्त रवैये के कारण नियमों की अनदेखी लाजिमी है.
नाबालिग हैं स्कूल वाहनों के ड्राइवर : आम तौर पर स्कूलों में इस्तेमाल किये जाने वाले छोटे वाहन भी सेफ नहीं है. 100 में से 80 प्रतिशत स्कूल छोटे वाहनों का उपयोग कर रही है, जिसमें मैजिक, वैन,ऑटो और पिकअप जैसे वाहन शामिल हैं. स्कूली वाहनों को चलानेवाले ड्राइवर भी अधिकांश तौर पर निमोछिया मिलते हैं. वहीं छोटे वाहनों में मुख्य रूप से ओवर स्पीड, फर्स्ट एड बॉक्स, अग्निशमन यंत्र आदि का पालन भी नहीं हो पाता. साथ ही, स्कूली वाहनों में बच्चों की संख्या अक्सर ओवरलोड देखी जाती है.
300 से अधिक हैं निजी स्कूल
जिले में चल रही 300 से अधिक निजी स्कूल के वाहनों पर निगाह दौड़ायी जाये, तो उन्हे देख कर ही उनकी फिटनेस का अंदाजा लगाया जा सकता है. लगभग सभी निजी स्कूलों में अपने वाहन उपलब्ध हैं, लेकिन फिटनेस व नियमों पर सभी वाहन खरे नहीं उतरते. हालांकि, स्कूल प्रशासन नियमों के पालन का दावा तो जरूर करते हैं, मगर इसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही है.
फोन पर नहीं, ऑफिस में आकर लीजिए बयान
परिवहन विभाग के डीटीओ के मोबाइल नंबर 9431039312 से जब बात की गयी, तो उन्होंने कहा कि बयान फोन पर नहीं, ऑफिस में आकर लीजिए और फिर फोन को काट दिया. दूसरी बार जब बात की गयी तो उन्होंने कहा कि मीटिंग में चले गये हैं. यह अलग बात है कि डीटीओ को ऑफिस में बैठने के अलावा मीिटंग व फिल्ड वर्क भी करना होता है, जैसा कि उनके मातहत बताते हैं.
अभिभावकों को संगठित होने की है जरूरत
कई राज्यों में अन्य संगठनों की तरह एक अभिभावक संगठन भी कार्य कर रहे हैं. इतने बड़े स्तर पर लापरवाही जिले के स्कूल बरत रहे हैं और इन पर कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हो रही. ये एक गंभीर समस्या है. ऐसे में अगर अभिभावक एकजुट होकर स्कूल के अनियमितता के विरुद्ध व छात्रों के हित को लेकर संगठित होते हैं, तो इनकी मनमानी कम की जा सकती है. वैसे इस मामले पर संबंधित विभाग को गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है.
संजय रघुवर, समाजवादी नेता सह समाजसेवी
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