जहर से ज्यादा अधंविश्वास व डर लेता है लोगों की जान

Updated at : 13 Jul 2017 10:23 AM (IST)
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जहर से ज्यादा अधंविश्वास व डर लेता है लोगों की जान

औरंगाबाद कार्यालय : इस साल सर्पदंश की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है. सदर अस्पताल में उपलब्ध आंकड़ों की मानें, तो पिछले कुछ महीनों में जिले में 10 लोगों की जान सर्पदंश जा चुकी है. इतने लोगों का पोस्टमार्टम यहां अस्पताल में हुआ है. हालांकि, सर्पदंश से मौत का वास्तविक आंकड़ा कहीं ज्यादा भी हो […]

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औरंगाबाद कार्यालय : इस साल सर्पदंश की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है. सदर अस्पताल में उपलब्ध आंकड़ों की मानें, तो पिछले कुछ महीनों में जिले में 10 लोगों की जान सर्पदंश जा चुकी है. इतने लोगों का पोस्टमार्टम यहां अस्पताल में हुआ है. हालांकि, सर्पदंश से मौत का वास्तविक आंकड़ा कहीं ज्यादा भी हो सकता है.
क्योंकि, अंधविश्वास के चक्कर में सर्पदंश के कई मामले अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते हैं. उपलब्ध आंकड़ों की मानें, तो दो माह में 60 लोग सर्पदंश की घटना का शिकार हुए हैं. इनमें विषैले सांप की घटना को काटने लेकर सदर अस्पताल में 10 लोग पहुंचे है. इनमें आठ लोगों को बचा लिया गया. जबकि, दो की मौत हुई है. तीन लोगों को बड़े चिकित्सालय में रेफर किया गया. वर्तमान में सदर अस्पताल में 52 यूनिट एंटीवेनम वैक्सिन उपलब्ध हैं. कुटुंबा प्रखंड में सर्पदंश के शिकार छह लोगों का पता चल रहा है.
इनमें चार लोग अस्पताल पहुंचे, जिन्हें बचा लिया गया. दो लोग झाड़-फूंक के चक्कर में अस्पताल नहीं पहुंचे और इनकी मौत हो गयी. फिलहाल, कुटुंबा रेफरल अस्पताल में छह यूनिट वैक्सिन उपलब्ध है. बारुण पीएचसी में सर्पदंश की घटना का कोई भी मरीज नहीं पहुंचा है, यहां चार वैक्सिन उपलब्ध है. मदनपुर पीएचसी में सर्पदंश की घटना का एक मरीज पहुंचा, जिसे एंटीवेनम वैक्सिन देकर बड़े अस्पताल में रेफर कर दिया गया.
इस मरीज की जान बच गयी. दाउदनगर अनुमंडल मुख्यालय के अनुमंडल अस्पताल और पीएचसी में सर्पंदंश का कोई मरीज नहीं पहुंचा है. पीएचसी में पांच और अनुमंडल अस्पताल में 10 वैक्सिन उपलब्ध है. ओबरा पीएचसी में सर्पदंश का कोई भी मरीज नहीं पहुंचा है. यहां पांच वैक्सिन उपलब्ध है. रफीगंज पीएचसी में सर्पदंश का कोई भी मरीज नहीं पहुंचा, यहां तीन वैक्सिन उपलब्ध है. रेफरल अस्पताल, हसपुरा में एक भी मरीज नहीं पहुंचा है. यहां दो वैक्सिन उपलब्ध है. नवीनगर रेफरल अस्पताल में 12 वैक्सिन उपलब्ध है.
ओझा-गुनी के चक्कर में फंस कर गंवायी जान
अंबा थाना क्षेत्र के किशुनपुर निवासी अभिषेक कुमार (20 वर्ष) को सांप ने डंस लिया था. उसको इलाज के लिए अस्पताल ले जाने के बजाये झाड़-फूंक कराने के लिए ओझा-गुनी के पास ले जाया गया.
जहां उसकी मौत हो गयी. अगर उसे पीएचसी ले जाकर एंटीवेनम (विषरोधी इंजेक्क्शन) दिया जाता, तो संभवत: उसकी जान बच सकती थी. दूसरा मामला धनिवार गांव के सुमन कुमारी (सात वर्ष) का है. जिसको सांप ने डस लिया था. उसको इलाज के लिये अस्पताल ले जाने के बजाये झाड़ फूंक कराने के लिए ओझा-गुनी के पास ले जाया गया. झाड़ फूंक कराने के दौरान ही उसकी मौत हो गयी
दवा की जगह झाड़-फूंक को तरजीह देना ठीक नहीं
कहीं शिक्षा की कमी और कहीं जागरूकता के अभाव में लोग आज भी अंधविश्वास के पीछे भाग रहे हैं.आम तौर पर ऐसी कई घटनाएं घटती हैं, जो शिक्षित लोगों को भी अंधविश्वासी बना देती हैं. सर्पदंश के बाद लोग चिकित्सालय जाने के जगह पर पीढ़ीयों से चली आ रही परंपरा व पुश्तैनी मान्यताओं को तरजीह देकर ओझा-गुनियों के पास पहुंच जाते हैं. यहां जब कोई फायदा नहीं होता, तो आखिरकार अस्पताल पहुंचते हैं. इसके कारण समय पर सही उपचार नहीं मिलने से व्यक्ति की जान भी चली जाती है. ऐसे कई मामले औरंगाबाद जिले में भी घटित हुए हैं, जिसमें झाड़-फूंक के चक्कर में लोगों की जान गयी है. वहीं, जो लोग समय रहते सरकारी अस्पताल पहुंचे हैं उन्हें बचा लिया गया है.
अधिकतर किस्म के सांपों में नहीं पाया जाता जहर
वर्षों से ऐसी मान्यता चली आ रही है कि सांप काटने पर झाड़-फूंक से किसी को जिंदा किया जाता सकता है. यही कारण है कि सर्पदंश के मामले में लोगों की जान जा रही है. इस वर्षा के मौसम में एक माह के अंदर कुटुंबा रेफरल अस्पताल में पहुंचे हैं, जिनमें कई ऐसे मामले थे, जिसमें सांप काटने के बाद उसका जहर शरीर में नहीं फैला और न एंटीवेनम की जरूरत पड़ी. जब इस मामले में चिकित्सा पदाधिकारी लालदेव सिंह से बात की गयी तो उन्होंने बताया कि सिर्फ दो तरह के जहरीले सांप यहां पाये जाते हैं. एक गेहूंअन और दूसरा करैत. इनके अलावे बहुत से सांप ऐसे हैं, जो विषैले नहीं होते और इनके काटने से बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता. शायद ऐसे ही मामले में लोग झाड़-फूंक करवा कर स्वस्थ होने की बात को मान्यता देने लगते हैं.
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