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Devshayani Ekadashi: कब है देवशयनी एकादशी, जानें चातुर्मास में क्यों नहीं किया जाता है शुभ कार्य

By Radheshyam Kushwaha
Updated Date

Devshayani Ekadashi: हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी, पद्मनाभा एकादशी, देवशयनी एकादशी के नाम से पुकारी जाने वाली एकादशी इस बार 01 जुलाई को पड़ रहा है. इस दिन से गृहस्थ लोगों के लिए चातुर्मास नियम लग लग जाते हैं. देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु जी शयन करने चले जाते हैं. इस अवधि में भगवान विष्णु पाताल के राजा बलि के यहां चार माह निवास करते हैं.

चातुर्मास संन्यासियों द्वारा समाज को मार्गदर्शन करने का समय है. इस बार चातुर्मास पांच माह का होगा. आम आदमी इन पांच महीनों में अगर केवल सत्य ही बोले तो भी उसे अपने अंदर आध्यात्मिक प्रकाश नजर आएगा. चातुर्मास में कोई भी मंगल कार्य- जैसे विवाह, नवीन गृहप्रवेश आदि नहीं किया जाता है.

वहीं, देवउठनी एकादशी 25 नवंबर 2020 (बुधवार) को है. इस समया पूरी तरह से ईश्वर की भक्ति में डूबे रहें, सिर्फ ईश्वर की पूजा-अर्चना करें. बदलते मौसम में जब शरीर में रोगों का मुकाबला करने की क्षमता यानी प्रतिरोधक शक्ति बेहद कम होती है, तब आध्यात्मिक शक्ति प्राप्ति के लिए व्रत करना, उपवास रखना और ईश्वर की आराधना करना बेहद लाभदायक माना जाता है.

वास्तव में यह वे दिन होते हैं जब चारों तरफ नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगता है और शुभ शक्तियां कमजोर पड़ने लगती हैं. देवप्रबोधिनी एकादशी से देवता के उठने के साथ ही शुभ शक्तियां प्रभावी हो जाती हैं और नकारात्मक शक्तियां क्षीण होने लगती हैं.

देवशयनी एकादशी के चार माह के बाद भगवान विष्णु प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागते हैं. देवशयनी एकादशी प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा के तुरंत बाद आती है और अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत जून अथवा जुलाई के महीने में पड़ता है. चतुर्मास जो कि हिंदू कैलेंडर के अनुसार चार महीने का आत्मसंयम काल है, देवशयनी एकादशी से शुरू हो जाता है.

जानें कब है एकादशी

एकादशी तिथि प्रारम्भ- जून 30, 2020 को 07:49 बजे सायं

एकादशी तिथि समाप्त- जुलाई 01, 2020 को 05:29 बजे सायं

2 जुलाई को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय- 05:24 प्रातः से प्रातः08:13 बजे

पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय- 03:16 बजे सायं

देवशयनी एकादशी पूजा विधि

देवशयनी एकादशी व्रत को करने से व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है. एकादशी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है. व्रत की शुरुआत दशमी तिथि की रात्रि से ही हो जाती है. दशमी तिथि की रात्रि के भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए. अगले दिन प्रात: काल उठकर दैनिक कार्यों से निवृत होकर व्रत का संकल्प करें भगवान विष्णु की प्रतिमा को आसन पर आसीन कर पूजन करना चाहिए. पंचामृत से स्नान करवाकर, तत्पश्चात भगवान की धूप, दीप, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए. भगवान को ताम्बूल, पुंगीफल अर्पित करने के बाद मंत्र द्वारा स्तुति की जानी चाहिए. इसके अतिरिक्त शास्त्रों में व्रत के जो सामान्य नियम बताए गए हैं, उनका सख्ती से पालन करना चाहिए.

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