अधिक मासिक दुर्गाष्टमी पर करें मां आदिशक्ति की आराधना, यहां पढ़ें आरती और चालीसा के लिरिक्स

Adhik Masik Durgashtami: मासिक दुर्गाष्टमी के पावन अवसर पर मां दुर्गा को समर्पित चालीसा और आरती का पाठ करने का विशेष विधान है. मान्यता है कि इनके पाठ से नकारात्मकता दूर होती है और घर-परिवार में सकारात्मकता का संचार होता है.
Adhik Masik Durgashtami: आज 23 मई, शनिवार को मासिक दुर्गाष्टमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है. यह पर्व प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन भक्त व्रत रखकर विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं. इस वर्ष यह पर्व पुरुषोत्तम मास के दुर्लभ संयोग में पड़ रहा है, जिसके कारण इसका महत्व और भी बढ़ गया है. मान्यता है कि इस दिन जो भक्त सच्चे मन से माता की आराधना करते हैं, उनके जीवन से सभी प्रकार के दुख-दर्द दूर हो जाते हैं. साथ ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है. माता की पूजा के समय आरती और चालीसा का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है.
मां दुर्गा आरती
ॐ जय अम्बे गौरी
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी.
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को.
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै.
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी.
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती.
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती.
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे.
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी.
आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों.
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता.
भक्तन की दुख हरता, सुख-संपत्ति करता॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्परधारी.
मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती.
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
श्री अंबेजी की आरती, जो कोई नर गावे.
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपत्ति पावे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी॥
मां दुर्गा चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी.
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी.
तिहूं लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला.
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे.
दरश करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लै कीना.
पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला.
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी.
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें.
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
रूप सरस्वती को तुम धारा.
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा.
प्रकट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो.
हिरण्यकश्यप को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं.
श्री नारायण अंग समाहीं॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा.
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी.
महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता.
भुवनेश्वरी बगला सुखदाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी.
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
केहरि वाहन सोह भवानी.
लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै.
जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला.
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत.
तिहुँलोक में डंका बाजत॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे.
रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी.
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा.
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ संतनों पर जब-जब.
भई सहाय मातु तुम तब-तब॥
अमरपुरी अरु बासव लोका.
तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी.
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें.
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई.
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी.
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो.
काम क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को.
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप का मरम न पायो.
शक्ति गई तब मन पछितायो॥
शरणागत हुई कीर्ति बखानी.
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा.
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो.
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावें.
रिपु मूरख मोहि डरपावें॥
शत्रु नाश कीजै महारानी.
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला.
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥
जब लगि जियूं दया फल पाऊं.
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै.
सब सुख भोग परमपद पावै॥
देवीदास शरण निज जानी.
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥
जय माता दी.
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By Neha Kumari
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