समाज की पहचान

एक साथ चलने मात्र से भी समाज नहीं बनता. कभी-कभी लोग बस, ट्रेन या हवाई जहाज में एक साथ यात्रा करते हैं तो इस तरह की संगति को समाज नहीं कह सकते हैं.साथ चलते लोगों का समूह समाज तब कहलाता है, जब विभिन्न लोग सामूहिक आदर्श से प्रभावित होकर उस आदर्श की प्राप्ति के लिए […]
एक साथ चलने मात्र से भी समाज नहीं बनता. कभी-कभी लोग बस, ट्रेन या हवाई जहाज में एक साथ यात्रा करते हैं तो इस तरह की संगति को समाज नहीं कह सकते हैं.साथ चलते लोगों का समूह समाज तब कहलाता है, जब विभिन्न लोग सामूहिक आदर्श से प्रभावित होकर उस आदर्श की प्राप्ति के लिए एक साथ आगे बढ़ते हैं. ऐसी सामाजिक प्रगति का अर्थ होता है एक साथ चलते हुए आपसी एकता को मजबूत करना.
ऐसी सामाजिक जागरूकता कैसे पैदा की जाये? जब तक एक आदर्शवान व्यक्तित्व की कमी रहती है, तब तक एक मजबूत समाज का निर्माण नहीं हो सकता. हमारी सामाजिक चेतना का मूल मंत्र एक साथ चलने और एक साथ चिंतन करने में है. जहां ऐसी स्थितियां नहीं होतीं, वहां जीवन लक्ष्यविहीन होता है.
पर यहां एक दुविधा है. वह यह है कि हर मनुष्य के कार्य करने और चिंतन का तरीका अलग होता है. मनुष्य की विविध अभिव्यक्तियां ही अलग-अलग संस्कृतियों का निर्माण करती हैं और इन्हीं से किसी समाज की पहचान कायम होती है. एक समूह के व्यक्ति की अभिव्यक्ति दूसरे समूह के व्यक्ति से भिन्न हो सकता है, लेकिन उनमें कई समानताएं भी तो होती हैं.
सभ्य समाज का निर्माण करना है तो यह हमरा कर्तव्य है कि लोगों को अपने आचरण पर काबू करना सिखाएं. समाज को सभ्य बनाने के ऐसे प्रयासों से उसका सांस्कृतिक विकास भी होगा.
श्री आनंदमूर्ति
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