भाविक सपनों का होता है सर्वाधिक प्रभाव
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 31 Aug 2019 4:38 AM
मार्कण्डेय शारदेय, ज्योतिषाचार्य जाग्रत और सुषुप्ति दोनों का संधिकाल है- स्वप्न. दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, प्रार्थित, कल्पित, भाविक, दोषज- ये इसके सात प्रकार हैं. जो देखा, जो सुना, जैसा अनुभव किया, जो चाहा तथा जैसी कल्पना की- ये ही क्रमशः पूर्वोक्त पांच प्रकार हैं. वात, पित्त एवं कफ- इन दोषों के विकृत होने से भी तदनुकूल […]
मार्कण्डेय शारदेय, ज्योतिषाचार्य
जाग्रत और सुषुप्ति दोनों का संधिकाल है- स्वप्न. दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, प्रार्थित, कल्पित, भाविक, दोषज- ये इसके सात प्रकार हैं. जो देखा, जो सुना, जैसा अनुभव किया, जो चाहा तथा जैसी कल्पना की- ये ही क्रमशः पूर्वोक्त पांच प्रकार हैं. वात, पित्त एवं कफ- इन दोषों के विकृत होने से भी तदनुकूल स्वप्न होते हैं, जो दोषज की श्रेणी में आते हैं. इन छह प्रकार के स्वप्नों का कम प्रभाव होता है. सर्वाधिक प्रभाव भाविक अर्थात वैसे सपने, जिनके बारे में सोचा, देखा या सुना नहीं गया हो, का होता है.
दिवास्वप्न तो निष्फल होता ही है, देखने के बाद सो जाने पर या दो-तीन बार देखने पर अंतिम को छोड़ और सभी निष्फल हो जाते हैं. पुनः शुक्लपक्ष की त्रयोदशी-चतुर्दशी तथा कृष्णपक्ष की प्रतिपदा, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी एवं अमावस्या की रात्रि में देखे गये सपने कभी सफल नहीं होते.
हां, शुभाशुभ फल देनेवाले ये सपने ऐसे भी हैं, जिनमें से कुछ शीघ्र प्रभावी होते हैं, तो कुछ समय लेते हैं. स्वप्न का फल कितने समय में मिलेगा, यह निर्धारित करता है कि स्वप्न रात्रि के किस पहर में देखा गया है. रात्रि के प्रथम पहर में देखे गये स्वप्न एक वर्ष में, द्वितीय पहरवाले 7-8 महीने में, तीन पहरवाले तीन महीने में, चौथे वाले 16 दिन से एक मास में, ब्रह्ममुहूर्त वाले 10 दिनों में एवं सूर्योदय के कुछ पूर्व देखे गये स्वप्न अतिशीघ्र 10 दिनों के अंदर अपना फल देते हैं, ऐसी शास्त्रीय मान्यता कहती है.
इसी तरह तिथियों के आधार पर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, एकादशी, द्वादशी; कृष्णपक्ष की द्वितीया, पंचमी, षष्ठी- तिथियों के स्वप्न विलंब से फल देते हैं, तो शेष तिथियों का फल शीघ्र मिलता है. कुछ ऐसी तिथियां हैं, जिनमें देखे गये सपने शुभ के अशुभ और अशुभ के शुभ फल देते हैं या अपने पर देखे गये दूसरे पर व दूसरे के बारे में देखे गये अपने पर प्रभाव डालते हैं, वे हैं शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी, नवमी तिथियां.
स्वप्न-विज्ञान की अपनी मर्यादा
वस्तुतः हमारे यहां स्वप्नों का भी महत्व है. ज्योतिष और आयुर्वेद दोनों ने इसे अंगीकार किया है. हां, शुभाशुभ स्वप्नों की संख्या इतनी है कि बता पाना कठिन है तथा जब तक देखे गये सपनों की सारी स्थितियों के अनुसार निर्णय पर नहीं पहुंचा जाये तब तक फल-कथन उचित नहीं होगा.
इसलिए शुभ या अशुभ की श्रेणी में रखे इनसे संबंधित पुस्तकों में फल देख या पंडितों से पूछ कर जब तदनुकूल फल नहीं प्राप्त करते तो अविश्वास उत्पन्न होता है. जैसे ज्योतिष अटकल नहीं, आकलन चाहता है, वैसे ही स्वप्न-विज्ञान की भी मर्यादा है. वैदिक युग से ही हमारे पूर्वज इस पर शोध करते आये हैं. विदेशों में भी इसे नकारा नहीं गया है, इसलिए सपने को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. शास्त्रकारों ने अशुभ स्वप्नों की शांति का परामर्श भी दिया है.
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