National Girl Child Day: झारखंड की बेटियों का कमाल, कई मुश्किलों के बीच लिख रही अपनी सफलता की कहानी
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 24 Jan 2023 9:16 AM
National Girl Child Day: हर साल 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है. इस दिवस का उद्देश्य बेटियों के लिए रियायती या मुफ्त शिक्षा, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में आरक्षण, उनकी सहायता करना और रोजगार के क्षेत्र में नया अवसर देना है. कई मुश्किलों के बीच झारखंड की बेटियां सफलता की कहानी लिख रही.
रांची, लता रानी : आज राष्ट्रीय बालिका दिवस है. इस दिवस का उद्देश्य बेटियों के लिए रियायती या मुफ्त शिक्षा, कॉलेज तथा विश्वविद्यालयों में आरक्षण, उनकी सहायता करना और रोजगार के क्षेत्र में नया अवसर देना है. बेटियों के बेहतर स्वास्थ्य और सुरक्षित वातावरण भी बड़ी चुनौती है. इस दिन लैंगिक असमानता को लेकर जागरूकता पैदा करना है. एक सर्वे के अनुसार देश में 42 फीसदी लड़कियों को दिन में एक घंटे से कम समय मोबाइल फोन इस्तेमाल की इजाजत दी जाती है. इन मुश्किलों के बावजूद हमारी बेटियां हर दिन सफलता की कहानी लिख रही हैं.
अशोक नगर की सौम्या लोचन टेक्सटाइल डिजाइनिंग में अपनी पहचान बना चुकी हैं. वह देश के कई प्रसिद्ध ब्रांड्स के साथ काम कर रही हैं. हैंडीक्राफ्ट क्लस्टर के क्षेत्र में भी योगदान दिया है. सौम्या के डिजाइन का लोहा दुनिया देख चुकी है. गुजरात की खमीर क्राफ्टस सोसाइटी के साथ मिलकर उन्होंने पेटी चरखा को नया रूप दिया है. इसका परिणाम है कि कच्छ की कई औरतों को रोजगार का विकल्प मिला. साथ ही जय विलास महल और म्यूजियम ग्वालियर के साथ भी काम कर रही हैं. सौम्या कहती हैं : भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री की नींव यहां के कारीगरों के हाथ में है. जहां बाकी की दुनिया में फैशन बड़े ब्रांड्स बनाते हैं, वहीं प्राचीन काल से भारत का फैशन यहां की गलियों के कारखानों में बनता है. और इसे बनाने वाले होते हैं वो कारीगर, जिन्होंने पीढ़ियों से उसी क्राफ्ट के साथ काम किया है.
बर्द्धमान कंपाउंड की रागिनी कच्छप का राष्ट्रीय स्तर की पावर लिफ्टर के रूप में चयन हुआ है. सुविधाओं का अभाव था, पर भार उठाने का प्रशिक्षण घर से शुरू हुआ. डेकची से पानी भरकर अपनी क्षमता बढ़ायी. खान-पान भी बहुत बेहतर नहीं था. ऐसे में पारंपरिक भोजन माड़-भात से ताकत बढ़ायी. अब तक रागिनी तीन गोल्ड मेडल हासिल कर चुकी हैं. वह कहती हैं : मां ने प्रशिक्षण के लिए महिला समिति से लोन लिया और अमृतसर खेलने भेजा. नेशनल पावर लिफ्टिंग प्रतियोगिता में तीन गोल्ड मेडल जीत चुकी हूं.साथ ही स्ट्रांगेस्ट वीमेन का खिताब भी हासिल किया. रागिनी कहती हैं : कोच संदीप तिवारी से काफी कुछ सीखने को मिला. अब बेहतर खेल कर घर का सहारा बनना है. दिव्यांग भाई को उसके लक्ष्य तक पहुंचाना है.
रितिका कुमारी एनसीसी कैडेट हैं. इनका चयन यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम (येप) के लिए हो चुका है. इस दौरान बांग्लादेश जाने का मौका मिला. इसके पहले इंडियन आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के अधिकारियों से मौका मिला. वहीं बांग्लादेश में भारतीय राजदूत से भी मुलाकात की. इस दौरान रितिका ने कई युद्ध स्मारकों को नजदीक से देखा. मोंगला नेवल बेस से बीएनएस निशान पर नेवल क्रूज में शामिल होने का मौका मिला. येप की प्रक्रिया बहुत लंबी होती है. इसमें एक वर्ष की चयन प्रक्रिया के दौरान कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है. इसके बाद डायरेक्टरेट से चुनाव होता है. इन सभी कठिन पड़ावों को रितिका ने पार किया. रितिका का सपना डिफेंस से जुड़ना है.
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रातू रोड की रहनेवाली बिनीता घोष को इजराइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी में पीएचडी के लिए फुल स्कॉलरशिप मिली है. यह तक पहुंचना बिनीता के लिए आसान नहीं था. साधन की कमी थी, लेकिन हौसला था. खास बात है कि उन्होंने 19 वर्ष की उम्र में घर में लैब स्थापित कर ली. इस लैब से कई छात्रों को इंस्पायर करती रहीं. वर्ष 2017 में यंग साइंटिस्ट अवार्ड से सम्मानित हुईं. संयुक्त राष्ट्र में भी प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं. वह कहती हैं : यदि इच्छा हो, तो कोई भी रास्ता आसान हो जाता है. उनका सपना रांची वापस आकर गरीब बच्चियों को पढ़ाना है.
हरमू की चांदनी बड़ाईक बचपन से ही एक्टिंग की दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहती थीं. जुनून के दम पर नागपुरी फिल्म से मुंबई तक का सफर पूरा किया. शुरुआत चर्चित शो क्राइम पेट्रोल से हुई. अभिनय ऐसा कि छोटे पर्दे पर ब्रेक मिला. कलर्स टीवी के फन-ए-इश्क और स्टार भारत के सीरियल बाल शिव में भी अभिनय का दम दिखा चुकी हैं. रवि किशन के साथ दाे हिंदी फिल्मों में काम करने का मौका मिला. रवि किशन के साथ फिल्म वर्चस्व में काम किया, जिसकी शूटिंग धनबाद में हुई है. यह फिल्म शीघ्र ही रिलीज होनेवाली है. साथ ही नेटफिलिक्स की वेब सीरीज से जुड़ने का मौका मिला. मारवाड़ी कॉलेज की छात्रा रही चांदनी ने कहा : आदिवासी बेटियों को कमतर आंका जाता है, लेकिन मौका मिले तो हम भी प्रतिभा दिखा सकते हैं. जरूरत परिवार के साथ की है.
लिंग भेद की शुरुआत परिवार से शुरू होती है, जो सामाजिक भेद तक पहुंचती है. जरूरत है कि परिवार और समाज बेटियों से जुड़ी परंपरागत मनोवृत्ति पर गहन मंथन करे. परंपरागत सोच विचार से आगे निकल कर परिवार को अब बालिकाओं को एसेट बनाना होगा. पुरुषों को बेटियों के बाहरी कार्यों में सहभागिता को स्वीकार करना होगा. भारत के परिवार एवं समाज में बेटियों की पहचान पुत्री, पत्नी और मां से ही होती आ रही है. समय की मांग है कि अब बेटियों की पहचान एक व्यक्ति के रूप में हो.
-डॉ सुरेंद्र पांडेय, समाजशास्त्री
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