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Diwali 2022: इस दिवाली कुम्हारों की बढ़ी उम्मीद, तेजी से चला रहे चाक

Updated at : 19 Oct 2022 11:39 AM (IST)
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Diwali 2022: इस दिवाली कुम्हारों की बढ़ी उम्मीद, तेजी से चला रहे चाक

Diwali 2022: दीपावली में एक बार फिर दीया और बाती का मिलन होगा. लोगों के घर-आंगन मिट्टी के दीये से रोशन होंगे. दीपावली के नजदीक आते ही कुम्हार दीये बनाने के काम में तेजी से जुट हुए हैं. इनके चाक तेजी से चलने लगे हैं. पूरा परिवार मिट्टी के दीपक बनाने में लगा है. सबको इस बार अच्छी बिक्री की उम्मीद है.

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Diwali 2022: दीपावली में एक बार फिर दीया और बाती का मिलन होगा. लोगों के घर-आंगन मिट्टी के दीये से रोशन होंगे. दीपावली के नजदीक आते ही कुम्हार दीये बनाने के काम में तेजी से जुट हुए हैं. इनके चाक तेजी से चलने लगे हैं. पूरा परिवार मिट्टी के दीपक बनाने में लगा है. सबको इस बार अच्छी बिक्री की उम्मीद है. उम्मीद यह भी है कि इस बार उनकी दीपावली भी रोशन रहेगी. मिट्टी के दीये और खिलौने आदि बनाने के लिए माता-पिता के साथ बच्चे भी हाथ बंटा रहे हैं. कोई मिट्टी गूंथ रहा है, तो किसी के हाथ चाक पर मिट्टी के बर्तनों को आकार दे रहे हैं.

रामगढ़ से भी मंगाये जा रहे मिट्टी के बने हुए उत्पाद

कुम्हार टोली के छुनकी प्रजापति ने बताया कि मिट्टी की कमी और ट्रासंपोर्ट खर्च अधिक होने के कारण कई लोग दीया और मिट्टी की अन्य सामग्री बनाना छोड़ चुके हैं. चाक से बननेवाली मिट्टी की सामग्री को सुखाने की भी पर्याप्त जगह नहीं है, इसलिए दीपावली से जुड़े सभी उत्पाद जैसे दीये और खिलौने रामगढ़ से मंगवाये जा रहे हैं. वाहनाें से मिट्टी की सामग्री लाने से कई उत्पाद टूट जाते हैं, जिसका नुकसान कुम्हारों को ही उठाना पड़ता है. ट्रासंपोर्ट खर्च बढ़ने से हमारी कमाई काफी कम हो जाती है.

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मिट्टी के दीये का महत्व

मान्यता है कि मिट्टी का दीपक जलाने से घर में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है. शौर्य और पराक्रम में वृद्धि होती है. मिट्टी को मंगल ग्रह का प्रतीक माना जाता है. मंगल साहस और पराक्रम में वृद्धि करता है और तेल को शनि का प्रतीक माना जाता है. शनि को न्याय और भाग्य का देवता कहा जाता है. मिट्टी का दीपक जलाने से मंगल और शनि की कृपा प्राप्त होती है.

दो साल के नुकसान की भरपाई नहीं होगी पूरी

छुनकी प्रजापति ने कहा कि इस वर्ष की कमाई से पिछले दो वर्ष की भरपाई नहीं होगी. मिट्टी के पुराने उत्पाद टूटने लगते हैं और काले भी पड़ जाते हैं. खुला बाजार में 100 रुपये में 100 दीये बिकते हैं, जबकि कुम्हारों को इसकी तुलना में कम कीमत मिलती है. वहीं 1000 दीयों पर 800 रुपये की लागत आती है.

आशा है कि हमारे बच्चे भी दीपावली मना पायेंगे

कुम्हार शांति देवी ने कहा कि इस वर्ष हमारे मिट्टी के उत्पाद बिकेंगे. पूरा परिवार इसी पारंपरिक पेशे से जुड़ा हुआ है. घर की छत पर चाक के दीयों को सूखा रही हूं, लेकिन मौसम के कारण माल पक नहीं पा रहा है. सरकार भी कुम्हार पर ध्यान नहीं देती. उम्मीद है कि अच्छी बिक्री हाेगी, ताकि हमारे बच्चे भी दीपावली मना पायेंगे.

तेजी से चाक चला रहे कुम्हार

खराब मौसम के बावजूद कुम्हार अपने चाक को तेजी से चला रहे हैं. आर्थिक तंगी से जूझ रहे कुम्हारों को दीपावली से काफी उम्मीदें हैं. लेकिन मौसम की मार कुम्हारों को परेशान कर रही है. कुम्हारों का कहना है कि कोराेना काल में हुए नुकसान की भरपाई में सरकार ने किसी तरह का सहयोग नहीं किया. सरकार अनदेखी कर रही है.

इस वर्ष, तो उम्मीदें हैं लेकिन बारिश की चिंता

बोड़िया निवासी जलेश्वर प्रजापति को इस दिवाली से काफी उम्मीदें हैं. वह पत्नी धनमति देवी और बच्चों के साथ मिलकर दीये और पारंपरिक खिलौने तैयार करने में जुटे हुए हैं. उन्होंने कहा कि दो वर्षों से कमाई ठप है. इस वर्ष उम्मीद जगी है, लेकिन मौसम के कारण माल तैयार करने में परेशानी हो रही है.

लोगों को पसंद आ रहे मिट्टी से बने उत्पाद

कुम्हार टोली के जगदीश प्रजापति अब भी पारंपरिक पेशे से जुड़े हुए हैं. दीपावली के अवसर पर पूरा परिवार एकजुट होकर दीया और खिलौना तैयार करता है. इन सामग्रियों को तैयार करने के लिए बंगाल से भी आधुनिक चीजें मंगवायी गयी है. लोगों को मिट्टी के उत्पाद पसंद आ रहे हैं.

हर वर्ष जाती हूं कुम्हारों के पास

हर वर्ष कुम्हारों के हाथ के बने दीयों से ही घर और हॉस्टल को सजाती हूं. मेरे हॉस्टल दीपशिखा को सजाने के लिए काफी संख्या में दीये की जरूरत होती है. इसलिए मैं कुम्हारों के पास जाती हूं. इससे इनकी बिक्री में सहयोग भी हाे जाता है.

यहां जानिए मिट्टी के उत्पादों की कीमत

  • दीया 80-100 रुपये सैकड़ा

  • छोटा दीया 50 रुपये में 100 पीस

  • डिजाइनर दीया 05-20 रुपये प्रति पीस

  • ग्वालिन 40-100 रुपये

  • मिट्टी के खिलौने 100-250 रुपये

  • घर सजाने की चीज 10-1000 रुपये

इनकी दीपावली में करना चाहिए सहयोग

संगीता देवी कहती हैं दीपावली पर अक्सर यहां के कुम्हारों के हाथ के बने दीये लेकर जाती हूं. बाजार में तो बहुत तरह के दीये होते हैं, लेकिन मिट्टी के दीयों से ही घर रोशन होता है. दो साल से इनकी बिक्री नहीं हुई. इस वर्ष हमें इनकी दीपावली मनाने में सहयोग करना चाहिए.

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